Monday, June 29, 2026

Bacon's Library

 

In Bacon’s Library, where secrets often gleam,

Things are never quite just as they seem.

What appeared so ordinary, quiet, and deep,

Held mysteries where the dusty shadows creep.


A continent of books, with no signs or stops,

Where one might get lost past the towering tops.

But guiding the way, with a smile and a file,

Was the Librarian, Ms. Ant, with a bibliophile’s style.


From encyclopedias to humor, or fantasy to DIY,

She stacked up the piles, reaching toward the sky.

Ms. Ant was the collector, with knowledge so tall,

"The heart of the library," they’d lovingly call.


But order and neatness? Not her best skill,

Finding Harry Potter in History? A disorganized thrill!

So, to save the day, with her dandy legs and bands,

Came the helpful assistant—Ms. Webbs lent a hand.


She spun silky labels for genre and age,

Putting back every book, every spine, every page.

With books in their places, arranged in a row,

Ms. Webbs loved to watch the library glow.


Then came the regular, a scholar, Professor Bee,

"Because of such readers, the library is free!"

She noted recommendations for students to share,

With a buzz of excitement and scholarly care.


But one sunny morning, a disaster was brewing,

A shock to the trio, and a great undoing!

A page, half-eaten—a sight quite untrue—

They had to find the culprit before the books were all through.


The investigation began, the three started to plot,

To catch the intruder, right there on the spot.

They soon realized, with a shiver and a spat,

The thief was the greedy, and filthy, old Rat!


With no taste for stories, just paper to bite,

He crept through the shelves in the middle of the night.

But the trio stood guard, alert and so bold,

Waiting to catch him, just as they’d told.


They flickered their torches, blinding him bright,

He tripped on the piles in the soft library light!

The authorities came, and he faced the magistrate,

While the trio was hailed for their heroic fate.


For the damage he caused, the Rat had to pay,

And the courage of the team saved the books for the day.

With the gold, Ms. Ant collected; Ms. Webbs set the glee;

And the books were returned by the kind Professor Bee.


Peace was restored in the quiet and grand,

The finest library in all of the land.

For in Bacon’s great vision, as the trio could see,

Knowledge stays safe when we keep it all free.


Divine Clay

 When God created man, spineless he proved to be,

So from the void, a woman was carved, sculpted, and set free.

Unlike the man who was merely fashioned from the dust,

She was molded with stardust and forged in sacred trust.


Orion’s belt served as her tiara, crystalline and bright,

With constellations braided into tresses of the night.

Her tongue spun forth a choir of angels, a celestial harp to play,

Her eyes—those twin horizons—held the sun’s own golden ray;

Yet when she shut them, empires crumbled into cold decay.


Her bosom flows with life-tides, the sustenance of the kind,

Her womb, a sanctuary, the coziest shelter for the mind.

She is the paradox of iron—indestructible in strength,

Woven through with grace that spans the heaven’s width and length.


Her hands, her feet, her very prints guide us toward the gate,

And in that sacred space between her thighs, she seals the hands of fate.

Yet what makes her mortal is a spirit prone to prey,

Trapped within the duality of man, unable to outwit the fray.


From the foul-tongued serpent slithering in the shade of Eden’s tree,

To the ten-headed demon claiming lordship, unbridled and free—

Too many wolves wear the skin of sheep to hide their hollow trace,

And though she remains faultless, they blame her for their fall from grace.


She wipes away the remnants of her acidic, faceless ghost,

While thoughts begin to quake within, a silent, heavy host.

Oh, cruel and fractured man! With your hollow, shifting breath,

Tell me—how many faces have you worn to cloak your depth of death?

Saturday, June 27, 2026

Ram Bachpan Geet

 ठुमक -ठुमक चालत रघुराई 

मंद -मंद कोसल मुस्काई


गिरत -परत -उठत रघुनन्दन 

कनक पालिका में भाव भंजन 

पवन देव झूला झुलाये। 


खनक -खनक पायलिया बाजे 

हर रंग शोभे -सुन्दर -साजे 

किलकारी से जग खिल जाए 


तेज पर हारे त्रिपुरारी 

उमा जाए बल -बल बलहारी 

देव लोक फूलन बरसाए।  

Hanuman Stuti

 हनन कर मान का हनुमान पाया है 

खोल दो दरबार तुम्हरा दास आया है।  


सफल सगल पूरन करते कारज तुम हनुमान 

निश्चय प्रेम प्रतीति विनय करे सनमान।  

तुम्हरे कारण ही राम का नाम पाया है...


लक्ष्मण के हूँ प्राण के दाता राम ने सीने से लगाया है 

धु -धु दहन हो गयी लंका ,लंकेस्वर घभरया है।  

संकट मोचन के होने से संकट कंप -कंपापया है 


जड़बुद्धि को बल बुद्धि को पल तुम बदलते हो 

विपता में हो भक्त तुम्हारे अतिविलम्ब ना करते हो 

तुमको पाने को दासी ने गीत गाया  है। ..



Srijana ki Garjana

खोंटे से बंधे पालने में वह सो रही है,

फुसफुसाती बातों की निंदिया में खो रही है।

सितारों में उत्तम, तारों को मैं चुनती रहूँ,

मैं गाऊँगी गाथा, तुम बस सुनती रहो।


आरम्भ से आरम्भ करते हैं,

जब मनुष्य नामक प्राणी धरा पर उतरते हैं।

नर की रीढ़ से नारी बनती है,

शीतल, सौम्य, सुकुमारी लगती है।


युग-दर-युग बदलते हैं,

सुनें कैसे नर-नारी आगामी होकर बढ़ते हैं।

सौंप स्वयं को अग्नि में, सती स्वः करती है,

प्रेम के वेग से दहकती है।


दसों दिशाओं में रणविजय दशरथ बन जाते हैं,

जब साथ में रण पाटती कैकयी को पाते हैं।

हर पुरुष माँ के नाम से जाने जाते हैं,

जिनकी आँखों के आगे स्वयं सूर्य छुप जाते हैं।


हरण पर जिनके लंका फूँक दी जाती है,

दुशासन के रक्त से स्नान कर पाते हैं।

जहाँ यक्ष-गंधर्व-देव-त्रिदेव भी न कुछ कर पाते थे,

आवाहन कर देवी को वे बुलवाते हैं।


रणचंडी फिर उठ गुफाओं से निकलती है,

पाती है महिषासुर को, रक्तबीजों का पान करती है।

एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर के जब उन्हें थाम न पाते हैं,

वेग को संभालने स्वयं शंभू चरणों में आ जाते हैं।


परंतु अब मैं रवि का रथ खींच ला न पाती हूँ,

कैसे करूँ पार ये घाट, वर्तमान की सीढ़ियों पर ठहर मैं जाती हूँ।

मुझे भेड़ों के झुंड में बस भेड़िये दिखाई देते हैं,

घनघोर वन में मेमने की कर्कश किलकारियाँ सुनाई देती हैं।


कुकर्मों के आदि असुर सम्मुख आ जाते हैं,

वहशी गिद्ध बनकर वे नोच-नोच कर खाते हैं।

पर लाड़ली! सुनकर सब तुम सहम न जाना,

भय बसे तुममें, तुम इस वहम में न जाना।


तुम भगिनी हो मेरी, दमक-दमक गर्जना,

तुमसे ही तो है जग की सृजना।

प्रथम वंदना, नमन कर गाते हैं आरती तुम्हारी,

विचारों की वाणी हो तुम, बेचारी नहीं, नारी हो हमारी!


पवन के झूलों में तुम पा लो आकाश,

कामयाबी की सभा में हो तुम्हारा वास।

मैं हर रात्रि चमकते तारे चुनती रहूँ,

मैं गाती रहूँ और तुम सुनती रहो।

Friday, June 26, 2026

Dard ki Buniyaad

 

कपट की लकड़ियों से, कुल्हाड़ी को गढ़ा गया,

नीले शून्य आकाश में, तेज़ बिछोह लड़ा गया।


सह न पाए वार जब, हिमालय के कंधे बिखर गए,

इधर के उधर हुए लोग, और उधर के इधर गए।


ज़ख्मो को फाड़ती, हिंसा की धरा भर गई,

ज़मीन के हर टुकड़े पर, बँटवारे की नींव पड़ गई।


कटीली तारों से फिर, इन घावों की सिलाई हुई,

ऐंठे रहे सत्ताधीश, प्यादों से भरपाई हुई।


लहू की नदी में सवार, लाशों की नाव आई थी,

उजड़ गए थे घर, खंडर में तब्दील तन्हाई थी।


उखाड़ा गया आदमी को, जड़ें ज़मीन के साथ थीं,

बच्चे, औरतें, बेज़ुबान, क्या उनकी बिसात थीं?


जो थे राज के राजा, वे रस्ते के रंक हो गए,

तानाशाहों की जंग में, हम केवल एक अंक हो गए।


बेहद को सरहदों ने, एक हद में जकड़ लिया,

न जाने किस आपाधापी ने, इस वतन को पकड़ लिया।


कट गए, बँट गए, हम बँटते ही रह गए,

जी-जी कर भी ज़िंदगी में, मरते ही रह गए।


दृश्य देख यह, देव-दानव भी दंग थे,

लाल लहू में धुंधले, बचे-कूचे सब रंग थे।


वो महज़ लकीर नहीं, एक सिसकती हुई याद है,

पैंतालीस की दरिंदगी की, वो पक्की बुनियाद है।

Wednesday, April 22, 2026

Khamoshi ki cheekh

कभी खामोशी भी इक गूँजती चीख बन जाती है,

जब दिल के भीतर दबे कोई तूफान होते हैं।

दुनिया समझती है कि सब सामान्य है बाहर,

मगर अंतस में कहीं सब लहू रोते हैं।


जिनके स्वप्न असमय ही सुप्त हो जाते हैं,

वहाँ अकाल की वीरानियाँ छा जाती हैं।

कतरन-कतरन आदमी खुद ही गलता जाता है,

जब स्मृतियाँ भीतर ही भीतर खा जाती हैं।


ऐसे खंडहर फिर 'अश्वथामा' सा शाप बन जाते हैं,

जलते हुए रुख, राख का ही भोजन पाते हैं।

पर फिर... तपोवन से प्रसन्न हो ऋतुराज आते हैं,

ऐरावत पर सवार, नई उमंगें जगाते हैं।


विरह के राग को त्याग, मल्हार के गीत सजते हैं,

सूखी-खोखली आँखों में फिर सलिल (जल) भरते हैं।

तम में तपते आसमान पर घनघोर घटा छाती है,

तपन बुझाने को कुदरत स्वयं उतर आती है।


किन्तु... विलम्ब से आए देवों का उत्साह अब दम तोड़ चुका,

आस की डोर थामे जो बैठा था, वो आस छोड़ चुका।

सब रंग बेरंग हुए, बस यादें ही हाथ आती हैं,

हम हाथ पर हाथ धरे, क्यों व्यर्थ पछताते हैं?


तुम चीख कर तोड़ दो मौन की ये फौलादी दीवारें,

पड़ने दो इन रूढ़िवादी बंधनों पर गहरी दरारें।

तुम स्वयंभू, तुम जगन्नाथ, कल्याण करो इस विश्व का,

त्याग दो अमरत्व का मोह, घूँट भरो अब विष का!





 

Monday, April 20, 2026

Pedo ki Panchayat

कह गए कोई व्यक्ति विशेष महान,

सत्य विचलित हो सकता, पर तजता नहीं स्थान।

पराजित भले न हो, पर होता है परेशां,

सुनो आज वृक्षों की व्यथा और उनकी दास्तां।


वातो-वृक्षों ने मिलकर फिर गुहार लगाई,

आज कुंज-वाटिका में एक पंचायत बिठाई।

सरपंच पीपल ने पंचों संग गंभीर विचार किया,

मनुष्य के दुर्व्यवहार का सबने मिलकर सार किया।


हम वसुधा की कोख के हैं असली लाल कहाते,

सलिल का भोजन पाते, अंबर तक हाथ बढ़ाते।

पवन-देव के अश्व हम, सूर्य का तेज पी जाते हैं,

प्राणवायु के दूत हम, जग का ताप मिटाते हैं।


भुजा हमारी सावन के झूले, हरित केश लहराते हैं,

पुष्प-गजरों से लदकर हम उपवन को महकाते हैं।

फलों का सेहरा माथे पर, जो सबका पोषण करता है,

पर मानव का लोभ सदा, इन प्राणों पर ही मरता है।


बैठे लोभी बेताल मनुज, हमें अपाहिज करते जाते हैं,

छील-काटकर देह हमारी, कंकाल बनाते जाते हैं।

चीखती हस्ती, चिंगारते गज, कौवे शोर मचाते हैं,

जब पावक की लपटों में ये, हमें भस्म कर जाते हैं।


शोक बरसता अंबर से, जब वन, वन नहीं रहता है,

बताओ इस अन्याय पे, मनुज का कानून क्या कहता है?

कभी मन्नतों के धागे बांध, हमें देव बताते हैं,

जी भरता है तो लालच में, कुल्हाड़ी चला गिराते हैं।


हमारे अंश से ही पले, न्याय के ये आलय हैं,

कानून की देवी के पन्ने, हमारे काष्ठ का ही आश्रय हैं।

क्या सत्य हार स्वीकार कर, मौन होकर बैठा है?

या न्याय का तराजू भी, अब स्वार्थ में ही पैठा है?


पुष्पों को जब भेदते हो, तब हारों के हार चढ़ते हैं,

हमें कुरेदकर ही तो, माथे के तिलक उभरते हैं।

सिलबट्टे पर पिसकर ही, रंग हिना का निखरता है,

कागज बनकर तन हमारा, अक्षरों को रूप धरता है।


सबसे पावन श्वास तुम्हारी, हमसे ही तो आती है,

पर विडम्बना देखो, हमारी लकड़ी ही तुम्हारी अर्थी सजाती है।

गर अब भी तुम न जागे, तो चिर-निद्रा में सोते रहना,

होगा जब अति-विलम्ब, तब हमसे कोई उलाहना न कहना।


मत कहना कि समय रहते, किसी ने तुम्हें बताया नहीं,

तुम्हारी लापरवाही के पालने को, किसी ने हिलाया नहीं।

उचित यही है, आज अभी से संरक्षण में जुड़ जाओ,

हम ही 'आधार' हैं तुम्हारे, हमें बचाकर स्वयं को बचाओ।

Tuesday, April 7, 2026

Chanakya ki Chetawani


मेरी नीतियों की नींव पर, यह सारा विश्व बना है,


मैंने ही राजधर्म का, पावन ताना-बाना बुना है।


तर्क के पैने बाणों ने, कुरीतियों के सीने चीरे हैं,


मेरे पोषित शिष्य सदा ही, बनकर लौटे वीर हैं।


शास्त्रों में 'अर्थ' को समझाकर, लाभ-हानि का भेद बताया,


नियम रचे ऐसे कि कोई, मनमानी न कर पाया।


किन्तु आज के वर्तमान में, मैं अत्यंत उदास हूँ,


तर्कहीन, निरुद्देश्य खड़ा, मैं केवल रिक्त आभास हूँ।


यह भयावह दृश्य देख, मन मेरा सदा डराता है,


समाज की संकीर्णता से, साक्षात्कार करवाता है।


'कानन-न्याय' से चलती सत्ता, आज यहाँ जंगल राज है,


शक्ति के नखों से नोच रहा, निर्बल को लोभी बाज़ है।


किस 'हरि' का अब कहाँ यहाँ, कोई बस चलता है?


अंधेरे को निगलने वाला बालक, आज रोशनी को तरसता है।


विद्या पर प्रश्न उठते ही, पग मेरे डगमगाते हैं,


अज्ञानी भी गर्व से खुद को, मेरा वंशज बताते हैं।


सुनो शिक्षकों! मंथन करके, क्या तुम उत्तर दे पाओगे?


छैनी और हथौड़े से, क्या नया नायक गढ़ पाओगे?


अज्ञानता के पर्वतों को काटकर, ज्ञान का रण बनाना है,


स्वयं उतरकर कीचड़ में, तुम्हें 'राजीव' खिलाना है।


वरना इन बाल-मस्तिष्कों को, स्वार्थ की दीमक लग जाएगी,


शून्यता का भोजन पाकर, यह पीढ़ी पंगु हो जाएगी।


दर्पण में क्या तुम अपनी, असली सीरत पहचानोगे?


मिथ्या मान-प्रतिष्ठा के, पर्दे कब तुम त्यागोगे?


अब भी बने रहे 'धृतराष्ट्र', तो घनघोर पाप करोगे,


जब लेखा होगा कर्मों का, तब कहाँ पश्चाताप करोगे?


'विद्यासागर' होने का, व्यर्थ न तुम अहंकार करो,


बनकर मेरे सच्चे वंशज, युवाओं में वैचारिक हुंकार भरो।


तुम सखा बनो, तुम पिता बनो, तुम मार्गदर्शक मीत बनो,


शंकाओं का जो दहन करे, तुम वो प्रज्वलित अग्नि-गीत बनो।


तुम्हारे कौशल से सिंचित, हर नर और नारी हो,


आत्मविश्वास से पूर्ण रहें, न लेशमात्र लाचारी हो।


तुम 'वशिष्ठ' बन मानव को, 'पुरुषोत्तम' बना सकते हो,


'परशुराम' बन शून्य को भी, 'शतकोटि' कर सकते हो।


अब यह चाणक्य विदा लेकर, तुमसे एक प्रण लेता है,


जाने से पूर्व अंतिम वचन, तुम शिक्षकों से कहता है—


यदि अपनी प्रतिभा और सामर्थ्य को, तुम व्यर्थ जाने दोगे,


तो भीषण अपराध करोगे, अनर्थ को अर्थ बनने दोगे!


कलम को अपनी शस्त्र बनाओ, नया इतिहास रचा देना,

 उठो कि राष्ट्र के माथे पर, तुम ज्ञान का तिलक लगा देना।

Friday, March 20, 2026

Ganga Shantanu sanvaad


गंगा का आत्म-परिचय

परलोक से उतरी धरा पर, शिव की जटा में जो बसी,

वेग जिसका रुद्र थामें, जो अमृत्व की हँसी।

श्रीहरि के चरणों से निकली, भगीरथ की सारथि बनी,

शोक-हारिणी, मोक्ष-दायिनी, मैं श्रेष्ठ तर्पण-तारिणी।


हिमवान की मैं अंश हूँ और कालिंदी की बहन मैं,

चंचल प्रकृति है मेरी, मकर मेरा वाहन यहाँ।

अनंत से जो वेग आया, वह न थमा न रुक सका,

भले राजा हो या रंक, कौन सम्मुख न झुक सका?


मेरे आँचल में समातीं, अस्थियाँ योद्धाओं की,

शांत करती राख को, और ज्वाला जलती बस्तियों की।


शांतनु का आक्षेप (क्रोध और व्यंग्य)

दमकती दामिनी सी तुम, नक्षत्रों में चमकती थी,

तुम्हारी उग्र लहरों में, एक नियति उभरती थी।

तब गरजते थे गज और सिंह, जब तुम यहाँ आई थी,

किसी राजन की सृष्टि की, तब नींव लहराई थी।


कर को पीट कर बोले भूप, वचन सुन अंबर डोला था,

स्वयं की आरती कर, तुमने गर्व मुख खोला था।

"क्या बात है? अपनी प्रशंसा स्वयं ही तुम गाती हो?

ममत्व तजकर, स्वयं को देवी बताती हो?"


हे गंगे! इस काल का, शिल्पी महा-अहंकार है,

तेरे कृत्यों पर लगा, विवशता का भार है।

वचनों में बँधी कैकयी, कुंती भी लाचार थी,

पर तू तो जननी होकर भी, बड़ी क्रूर और निर्दोष-मार थी!


मौन होकर तुम खड़ी, उन शिशुओं को बहाती रही,

कैसी सर्पिणी थी जो, पाताल में समाती नहीं?

लज्जा से तुम्हें, निज जल में ही डूब जाना था,

फिर कभी न इस जगत को, मुख अपना दिखाना था।


गंगा का प्रत्युत्तर (पीड़ा और तर्क)

एक-एक शब्द बाण बन, मर्म को जो भेदता,

सब्र जाह्नवी का टूटा, हृदय को जो रेखता।

"हे चन्द्रवंशी शांतनु! ये शब्द शोभा न देते हैं,

काँच के महलों वाले, क्यों पत्थर फेंका करते हैं?"


हाँ, इन्हीं करों (हाथों) से मैंने, निज शिशु बहाए थे,

पर एक जो सौंपा तुम्हें, क्या उसे तुम अपना पाए थे?

मुझ अभागिन को तो, श्रापों के दंश लड़ रहे थे,

पर आप तो राजन थे, तब आप क्या कर रहे थे?


मेरी कोख से जन्मे थे, वे महापराक्रमी भीष्म,

जो आज शर-शय्या पर, सह रहे पीड़ा भीषण।

दिव्य-पुत्र देवव्रत को, तुमने दास सा काम दिया,

पितृ-मोह का उन्हें, यही प्रतिफल और इनाम दिया?


आप तो स्वर्ग पधार गए, कर्त्तव्य को त्यागकर,

पुत्र की नियति देख, हार गए अश्रु भी जागकर।

अब मौन रहिए राजन, उपालंभ (शिकायत) अब न दीजिए,

मेरे घावों को खरोंचकर, उन्हें और न सींचिए।


इतिहास में हमारे कर्म, कभी व्यर्थ न जाएँगे,

आने वाले मात-पिता,  हमसे सीख पाएंगे।  




Monday, March 9, 2026

Krodh



युगों-युगों से शोध का हम, विषय गहन बन जाते हैं,

जो हर ले विवेक की आभा, हम 'क्रोध' वही कहलाते हैं।

भ्रष्ट करे जो बुद्धि मनुज की, वह प्रखर प्रणाम हमारा है,

संहार की लपटों में लिपटा, अस्तित्व ये जग से न्यारा है।


हमारे तेज से ही तो, आशुतोष 'रुद्र' बन जाते,

काम की वासना भस्म कर, हम ही 'शिव' को जगाते।

जब सौम्य गौरी पहन चंडी का, विकराल वसन आ जाती हैं,

रक्तबीज का रक्त चूस कर, असुरों को धूल चटाती हैं।


हम मौन भाव के कुंभकरण, शांत शून्य में सुप्त पड़े,

पर जब पालना हिले व्यवस्था का, हम तब विनाश बन खड़े।

कु-कर्मों की कालिख पोत कर, प्रतिशोध का हम रूप धरते,

स्वर्ण नहीं, कोयला बनकर, हम स्वयं दहन में जलते।


जब लोभ-मोह के सर्प हमें, कसकर स्वयं में लपेटते,

पाप के वृश्चिक तड़प कर, हम ही की ओर घसीटते।

हमारी सुर्ख लालिमा पर, जब अज्ञान की धूल जम जाती,

तब मर्यादा की सीमा लांघ, हम पाताल तक उतर जाती।


अक्सर मनुष्य डरा क्यों करता, हमारे इस प्रलय स्वरूप से?

अंधकार में हमें दबाकर, छुपता है क्यों वो स्व-रूप से?

पर वीर गाथाओं के हम ही, प्रेरक भाव बन जाते,

जटायु का बलिदान देख, हम ही प्रभु की गोद दिलाते।


भीष्म की प्रतिज्ञा का आधार, हम ही तो कहलाते,

अन्याय देख जो उठ खड़ा हो, हम वही शक्ति बन जाते।

उपेक्षित कर हमें हृदय में, बाद में जो आप उफनते,

वही विष बन कर अंतस में, नीलकंठ से भी न पचते।


स्वीकारो कि भावनाओं के, हम भी अभिन्न अंश हैं,

विरह की टीस में दर्द बनकर, हम भी निष्ठुर वंश हैं।

कुचल हमें जो बढ़ोगे आगे, राह का काँटा बन जाएंगे,

सँभाल लो हमें विवेक से, हम 'सहस्त्रबाहु' बन जाएंगे।


भिन्न-भिन्न है भावनाएँ, भिन्न-भिन्न है ज्ञान,

क्रोध भी है एक शक्ति, दीजिए इसको सम्मान।





Tuesday, March 3, 2026

NavDurga

 शैलसुता कल-कल निनाद कर उतरती,

मृदुल कलरव से मानस हर्षित करती।

(प्रथम: शैलपुत्री)


श्वेत वसना, तप-आचरण पावन जिनका,

ब्रह्मचारिणी हरतीं संताप जन-जन का।

(द्वितीय: ब्रह्मचारिणी)


चंद्र-घंटिका करती गुंजित मधुर छन-छन,

दिव्य आभा से जुड़ता भक्तिमय अंतर्मन।

(तृतीय: चंद्रघंटा)


कुश-अंश से मांडतीं जो इस धरा को,

कुष्मांडा जीवंत करतीं चराचर जगत को।

(चतुर्थ: कुष्मांडा)


वात्सल्य की अमृत-धार जो पिलाती हैं,

स्कंदमाता ही ममता का सार सिखाती हैं।

(पंचम: स्कंदमाता)


कुकर्मों का मर्दन करतीं माँ कात्यायनी,

रक्तबीज-संहारिणी, दुष्ट-दल-दामिनी।

(षष्ठ: कात्यायनी)


काल-कपाल पर जो तांडव रचती हैं,

असुर-विनाशिनी वही कालरात्रि बनती हैं।

(सप्तम: कालरात्रि)


कोटि सूर्यों का तेज सौम्यता में समाया है,

महागौरी ने शुचि पावन रूप पाया है।

(अष्टम: महागौरी)


सुमति तराशकर जो श्रेष्ठ बुद्धि बनाती हैं,

सिद्धिदात्री ही सिद्धियों से अस्मिता सजाती हैं।

(नवम: सिद्धिदात्री)


नवगुण-धारिणी भवानी जग-रखवाली है,

हृदय को मंदिर बना, घर मेरे आने वाली है।

Tuesday, February 17, 2026

Shiv Kaise hai?

 कैलाश की अविचल जटाओं की जटिल गाँठें हैं,

स्थिर जहाँ जान्हवी, शशि-किरण को बाँधे हैं।


नेत्रों में मात्र निखिल सृजन झूलता है,

त्रिनेत्र खुलें जब, प्रलय ही उफनता है।


नासिका का श्वास-वेग जीवन की सरिता है,

निरंतर काल जिनका राम-नाम में रमता है।


अतिशयोक्ति, अनुप्रास, उपमा सब तुच्छ छोटी हैं,

उनके समक्ष, जो शून्य से शतकोटि हैं।


नीलकंठ की महिमा का कितना विस्तार दूँ?

क्या-क्या अपनी लेखनी से पन्नो पर  उतार दूँ?


कंठ के आभूषण सुशोभित विष और भुजंग हैं,

भस्म की रज से रमे अंग-प्रत्यंग हैं।


मुंडमाल सजे त्रिलोकीनाथ, वही त्रिपुरारी हैं,

हाथ में त्रिशूल सोहे, वृषभ की सवारी है।


डगमग चाल से भूचाल आ जाता है,

तांडव देख जिनके, महाकाल काँप जाता है।


गौरीश जिनकी महिमा अविरल गाते हैं,

देवों के देव, मात्र अंजलि-जल से प्रसन्न हो जाते हैं।


हर युग के राम के बजरंग आप ही रहेंगे,

'शिव सदा सहायते' हम यही कहेंगे।


विनती लघु सी, चरणों में शरण मिल जाएगी,

टल जाएँगी विपदा, भव-बाधा मिट जाएगी।


तुच्छ मेरी याचना, तुच्छ मेरा कहना है,

छाया बन क्षण-क्षण, संग प्रभु रहना है।