Friday, March 20, 2026

Ganga Shantanu sanvaad


गंगा का आत्म-परिचय

परलोक से उतरी धरा पर, शिव की जटा में जो बसी,

वेग जिसका रुद्र थामें, जो अमृत्व की हँसी।

श्रीहरि के चरणों से निकली, भगीरथ की सारथि बनी,

शोक-हारिणी, मोक्ष-दायिनी, मैं श्रेष्ठ तर्पण-तारिणी।


हिमवान की मैं अंश हूँ और कालिंदी की बहन मैं,

चंचल प्रकृति है मेरी, मकर मेरा वाहन यहाँ।

अनंत से जो वेग आया, वह न थमा न रुक सका,

भले राजा हो या रंक, कौन सम्मुख न झुक सका?


मेरे आँचल में समातीं, अस्थियाँ योद्धाओं की,

शांत करती राख को, और ज्वाला जलती बस्तियों की।


शांतनु का आक्षेप (क्रोध और व्यंग्य)

दमकती दामिनी सी तुम, नक्षत्रों में चमकती थी,

तुम्हारी उग्र लहरों में, एक नियति उभरती थी।

तब गरजते थे गज और सिंह, जब तुम यहाँ आई थी,

किसी राजन की सृष्टि की, तब नींव लहराई थी।


कर को पीट कर बोले भूप, वचन सुन अंबर डोला था,

स्वयं की आरती कर, तुमने गर्व मुख खोला था।

"क्या बात है? अपनी प्रशंसा स्वयं ही तुम गाती हो?

ममत्व तजकर, स्वयं को देवी बताती हो?"


हे गंगे! इस काल का, शिल्पी महा-अहंकार है,

तेरे कृत्यों पर लगा, विवशता का भार है।

वचनों में बँधी कैकयी, कुंती भी लाचार थी,

पर तू तो जननी होकर भी, बड़ी क्रूर और निर्दोष-मार थी!


मौन होकर तुम खड़ी, उन शिशुओं को बहाती रही,

कैसी सर्पिणी थी जो, पाताल में समाती नहीं?

लज्जा से तुम्हें, निज जल में ही डूब जाना था,

फिर कभी न इस जगत को, मुख अपना दिखाना था।


गंगा का प्रत्युत्तर (पीड़ा और तर्क)

एक-एक शब्द बाण बन, मर्म को जो भेदता,

सब्र जाह्नवी का टूटा, हृदय को जो रेखता।

"हे चन्द्रवंशी शांतनु! ये शब्द शोभा न देते हैं,

काँच के महलों वाले, क्यों पत्थर फेंका करते हैं?"


हाँ, इन्हीं करों (हाथों) से मैंने, निज शिशु बहाए थे,

पर एक जो सौंपा तुम्हें, क्या उसे तुम अपना पाए थे?

मुझ अभागिन को तो, श्रापों के दंश लड़ रहे थे,

पर आप तो राजन थे, तब आप क्या कर रहे थे?


मेरी कोख से जन्मे थे, वे महापराक्रमी भीष्म,

जो आज शर-शय्या पर, सह रहे पीड़ा भीषण।

दिव्य-पुत्र देवव्रत को, तुमने दास सा काम दिया,

पितृ-मोह का उन्हें, यही प्रतिफल और इनाम दिया?


आप तो स्वर्ग पधार गए, कर्त्तव्य को त्यागकर,

पुत्र की नियति देख, हार गए अश्रु भी जागकर।

अब मौन रहिए राजन, उपालंभ (शिकायत) अब न दीजिए,

मेरे घावों को खरोंचकर, उन्हें और न सींचिए।


इतिहास में हमारे कर्म, कभी व्यर्थ न जाएँगे,

आने वाले मात-पिता,  हमसे सीख पाएंगे।  




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