कपट की लकड़ियों से, कुल्हाड़ी को गढ़ा गया,
नीले शून्य आकाश में, तेज़ बिछोह लड़ा गया।
सह न पाए वार जब, हिमालय के कंधे बिखर गए,
इधर के उधर हुए लोग, और उधर के इधर गए।
ज़ख्मो को फाड़ती, हिंसा की धरा भर गई,
ज़मीन के हर टुकड़े पर, बँटवारे की नींव पड़ गई।
कटीली तारों से फिर, इन घावों की सिलाई हुई,
ऐंठे रहे सत्ताधीश, प्यादों से भरपाई हुई।
लहू की नदी में सवार, लाशों की नाव आई थी,
उजड़ गए थे घर, खंडर में तब्दील तन्हाई थी।
उखाड़ा गया आदमी को, जड़ें ज़मीन के साथ थीं,
बच्चे, औरतें, बेज़ुबान, क्या उनकी बिसात थीं?
जो थे राज के राजा, वे रस्ते के रंक हो गए,
तानाशाहों की जंग में, हम केवल एक अंक हो गए।
बेहद को सरहदों ने, एक हद में जकड़ लिया,
न जाने किस आपाधापी ने, इस वतन को पकड़ लिया।
कट गए, बँट गए, हम बँटते ही रह गए,
जी-जी कर भी ज़िंदगी में, मरते ही रह गए।
दृश्य देख यह, देव-दानव भी दंग थे,
लाल लहू में धुंधले, बचे-कूचे सब रंग थे।
वो महज़ लकीर नहीं, एक सिसकती हुई याद है,
पैंतालीस की दरिंदगी की, वो पक्की बुनियाद है।