खोंटे से बंधे पालने में वह सो रही है,
फुसफुसाती बातों की निंदिया में खो रही है।
सितारों में उत्तम, तारों को मैं चुनती रहूँ,
मैं गाऊँगी गाथा, तुम बस सुनती रहो।
आरम्भ से आरम्भ करते हैं,
जब मनुष्य नामक प्राणी धरा पर उतरते हैं।
नर की रीढ़ से नारी बनती है,
शीतल, सौम्य, सुकुमारी लगती है।
युग-दर-युग बदलते हैं,
सुनें कैसे नर-नारी आगामी होकर बढ़ते हैं।
सौंप स्वयं को अग्नि में, सती स्वः करती है,
प्रेम के वेग से दहकती है।
दसों दिशाओं में रणविजय दशरथ बन जाते हैं,
जब साथ में रण पाटती कैकयी को पाते हैं।
हर पुरुष माँ के नाम से जाने जाते हैं,
जिनकी आँखों के आगे स्वयं सूर्य छुप जाते हैं।
हरण पर जिनके लंका फूँक दी जाती है,
दुशासन के रक्त से स्नान कर पाते हैं।
जहाँ यक्ष-गंधर्व-देव-त्रिदेव भी न कुछ कर पाते थे,
आवाहन कर देवी को वे बुलवाते हैं।
रणचंडी फिर उठ गुफाओं से निकलती है,
पाती है महिषासुर को, रक्तबीजों का पान करती है।
एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर के जब उन्हें थाम न पाते हैं,
वेग को संभालने स्वयं शंभू चरणों में आ जाते हैं।
परंतु अब मैं रवि का रथ खींच ला न पाती हूँ,
कैसे करूँ पार ये घाट, वर्तमान की सीढ़ियों पर ठहर मैं जाती हूँ।
मुझे भेड़ों के झुंड में बस भेड़िये दिखाई देते हैं,
घनघोर वन में मेमने की कर्कश किलकारियाँ सुनाई देती हैं।
कुकर्मों के आदि असुर सम्मुख आ जाते हैं,
वहशी गिद्ध बनकर वे नोच-नोच कर खाते हैं।
पर लाड़ली! सुनकर सब तुम सहम न जाना,
भय बसे तुममें, तुम इस वहम में न जाना।
तुम भगिनी हो मेरी, दमक-दमक गर्जना,
तुमसे ही तो है जग की सृजना।
प्रथम वंदना, नमन कर गाते हैं आरती तुम्हारी,
विचारों की वाणी हो तुम, बेचारी नहीं, नारी हो हमारी!
पवन के झूलों में तुम पा लो आकाश,
कामयाबी की सभा में हो तुम्हारा वास।
मैं हर रात्रि चमकते तारे चुनती रहूँ,
मैं गाती रहूँ और तुम सुनती रहो।
No comments:
Post a Comment