Tuesday, August 11, 2026

Desh ki Neev

 मिट्टी में बंजरता थी,

चहुंओर बर्बरता थी।


शवगिरि खड़े हुए थे,

ख़ाक को छानकर हीरे थे खड़े हुए।


साबरमती के संत, जवाहर के लाल,

बाबासाहेब, पटेल और थे लाल-बाल-पाल।


तानाशाही को उखाड़ने क्रांति के प्रथम बीज थे,

जिनकी जड़ों से ही भविष्य को सींचते।


रक्त की ईंटों से स्वेद का बाँध बंधा है,

फिर जाकर यह साँचा सँवारा गया है।


मंद-मंद मुस्का रहे वसुधा के लाल,

भूमि-हवन में तप रहे वो बेमिसाल।


एक का हाथ नहीं है इसमें, सभी ने मिलकर तस्वीर बनाई है,

नींव रखकर के लोकतंत्र की, इस देश ने आज इमारत बनाई है।


जो प्रथम थे, वो पीपल हैं, वो बरगद हैं, हमारे बाग़बान हैं,

जिनके कर्मों से महकता यह खलियान है।


भला कभी कहीं बुजुर्गों की त्रुटियों को हम आजमाते हैं?

कुख्यात कर उनकी महिमा गिराते हैं?


जो छूट गया उस डोर को पकड़कर आगे बढ़ना होगा,

और जो स्वप्न बुन रहे थे, उसे साकार यथार्थ करना होगा।


उपालम्भ को त्यागो तुम, प्रगति का तुम ध्यान धर,

वर्तमान के सूर्य बन, इतिहास नया रच कर।


तुम विद्युत गति से बढ़ चलो, मत रोको अब पाँव,

विजयी भारत गूंजे सदा, हर दिशि फैले छाँव।