Monday, September 7, 2026

Bhakt Maala

 भक्त-माला सर्वोपरि, सर्वश्रेष्ठ भक्ति-विशेष है,

सवार जिसे भक्तों पर, भक्तन का वेश है।

शीश-थाल शीश पर, शीश बारंबार रावण चढ़ाता रहा,

आँत को काट-काट, धमनियों को बाँध-बाँध वीणा सुनाता रहा।

थमे ना थमे, स्वयं जगदीश हैं,

दस शीश, भुजा बीस, शिव के आशीष हैं।


प्रह्लाद की पुकार पर, नरसिंह का अवतार है,

फोड़कर-फाड़कर हिरण्यकश्यप, करते बालक को दुलार हैं।

मगन मार्कण्डेय, मृत्यु को पराजय कर रहे हैं,

हुँकारते महाकाल, काल से लड़ रहे हैं।


काशी की गलियों में, झूमते कबीर दास हैं,

राम नाम की मस्ती में, डूबे हर श्वास हैं।

रसखान की आँखों में, ब्रज का ही वास है,

कृष्ण-भक्ति में लीन, उनका अनन्य विश्वास है।


विट्ठल-विट्ठल खड़काते, संत तुकाराम हैं,

प्याले भर-भर पिए विष का, मीरा को बस यही आराम है।

अटूट असीम विश्वास, अपरंपार होता है,

भरने मायरा, भगवन स्वयं प्रकट होता है।


कसाई शालिग्राम को झुलाता है,

हाथों को खोकर भी नाचता जाता है।

कर-कर कर्मा बाई, भोर में खिचड़ी पकाती है,

पाने को भोग, जगन्नाथ दौड़े आते हैं।


भक्तों में शिरोमणि, महाराज हनुमान हैं,

जिनके बिना नहीं बनते, राम के कोई काज हैं।

भक्ति और भगवन में, अंतर कहीं फिर कहाँ होता है,

नैन होते हैं भक्त के, भगवन ही रोता है।


भक्त-माला का यह मोती, सदा जग में गाता है,

देख प्रेम भक्तों का, भगवान पिघल जाता है।

भक्ति की ही शक्ति से, जगमग सृष्टि होती है,

भक्ति बिना तो मूरत भी, केवल पत्थर होती है!

Baaghi- Baaghi

 बागी-बागी मुझे वह कहते हैं,

हम मुस्कुराते मौन खड़े रहते हैं।

बागी कहलाने में मुझे कोई खेद नहीं है,

बागी और प्रकृति में कुछ अंतर-भेद नहीं है।

ना हो विश्वास तो कथनों को मेरे सुनना,

और फिर उचित-अनुचित को चुनना।


सौरमंडल स्वयं पर खूब इतराता था,

अपनी परिधि के घेरे में नक्षत्रादिक को नचाता था।

फिर एक कंकड़ ने अपनी ताल बनाई थी,

ढकेला गया वह परिधि से, करनी पड़ी उसे भरपाई थी।

पर वह ना पछताया,

बहता हुआ धरती से टकराया!

फिर ऐसा भूचाल हुआ,

सहस्र तांडवों का परस्पर कमाल हुआ।

उस कंकड़ ने दी वसुधा को नवीन रेखा,

और कुछ ऐसे मैंने प्रथम बागी को बनते देखा।

बागी कहलाने में मुझको कोई खेद नहीं,

बागी और प्रकृति में कुछ अंतर-भेद नहीं।


सदियों पूर्व एक बीज को तम में दबाया गया,

कुपोषित कर उसे भीषण सताया गया।

पर वह भी मतवाला था,

हिम्मत करने वाला था।

अंकुर फोड़कर वह सूर्य को आँखें दिखलाता था,

हरा-भरा वह तना-तना बढ़ता ही जाता था।

वह कुचला, रेंगा, काटा गया,

कभी जड़ समेत वह उखाड़ा गया।

परंतु अजर-अमर वह लौट-लौटकर आता था,

जग में बागी कहाता था।

मुझे बागी कहलाने में कोई खेद नहीं है,

बागी और प्रकृति में कुछ अंतर-भेद नहीं है।


वह अनल जो मचलती-जलती है,

लपटें जिसकी पवन के वेग से लड़ती हैं।

वह कमल जिसका कीचड़ कुछ बिगाड़ ना पाता है,

निज सौंदर्य को पूर्ण नित्य निभाता है।

प्राणी जो विपरीत धारा पार कर जाता है,

झंझावातें घसीटती हैं, पर शिखरों पर परचम लहराता है।

योद्धा टिमटिमाते तेज से हुकूमतों को हिलाया करते हैं,

अपनी भवानी को नित्य ही शौर्य का रक्तपान पिलाया करते हैं।


फिर कुछ ऐसे भी हैं बागी,

झूले जो फाँसी के फंदे हैं।

अपनी धुन में हैं मगन,

सुख-दुःख के बंधन से अंधे हैं।

बागियों सा प्रेम कौन करेगा?

मिलाकर मिट्टी में खुद को, दूजों के लिए कौन मरेगा?


प्रत्येक कार्य कहाँ शांति से बनता है?

कभी छोड़ कमंडल, खड़ग उठाना पड़ता है।

कभी तो अपना जोर दिखाना पड़ता है,

फिर कहीं बागी को दानव को गिराना पड़ता है।

मैं भी उनका ही एक मामूली सा अंश हूँ,

दिखता हूँ मैं लघु, पर जागने पर विध्वंस हूँ।

इसी कारण मुझे बागी कहलाने से कोई खेद नहीं है,

बागी और प्रकृति में कोई अंतर-भेद नहीं है।