शेर-ए-पंजाब जो जीतते हर रण को,
हस्तियों पर सवार, कुचलते दुश्मनों के फण को।
जिनके जन्म पर शोक मनाया था जहाँ ने कभी,
माता राज कौर की कोख से वही महाराजा अवतरित हुआ तभी।
जिनकी दृष्टि से पाषाण भी पारस बन जाता था,
जो निकट आते, हर दिल उनका मुरीद बन जाता था।
भेद-भाव के पठारों को समतल कर डाला उन्होंने,
मानवता की भूमि पर न्याय का दीपक जला दिया उन्होंने।
अपनी गागर तोड़ सागर को नापा जिसने,
जहाँ रखे पग, वहीं "खालसा फ़तेह" का जयघोष हुआ गगन में।
बेर के कंकड़ खाकर भी मंद-मंद मुस्काते थे,
अकाल पद जाते हुए, निर्धन जन के घर राशन रख आते थे।
युद्ध में उतर कर वीरता की मिसाल गढ़ जाते थे,
अकाल की रज़ा में रमे, "वहिगुरु जी का खालसा" कह सो निहाल हो जाते थे।
कलगीधर का लाड़ला, लोक-प्रीय वो राजा प्यारा था,
स्वयं को तुच्छ मान, सदा खालसा का रखवाला था।
पंजाब की हर दिशा धम्मियों से गुंजित थी,
“राज करेगा खालसा” हर राह पर अंकित थी।
त्रुटि होने पर वह क्षण में नतमस्तक हो जाता था,
अकाली फूल्ला सिंह के चरणों में गिर पड़ता था।
हरी सिंह की हुंकार से अफ़गान काँप उठते थे,
शेर-ए-पंजाब के नाम से गोरे भी थर्रा उठते थे।
बारात में सोने-चांदी लुटाते थे वे उदार,
संग ही टक्साली राशि का लंगर करते थे तैयार।
ऐसे लाल जब वसुधा की गोद में समा जाते हैं,
तो भारतीय होने का गौरव और बढ़ाते हैं।
श्रोताओं! गर्व करो अपने इतिहास के स्वर्णिम प्रकाश पर,
रहे ये स्मरण हमारे अंतिम श्वास तक।
एक चिंगारी है यह — जो बढ़ती जाएगी,
देशप्रेम की लहर हर हृदय तक पहुँच जाएगी।