ठुमक -ठुमक चालत रघुराई
मंद -मंद कोसल मुस्काई
गिरत -परत -उठत रघुनन्दन
कनक पालिका में भाव भंजन
पवन देव झूला झुलाये।
खनक -खनक पायलिया बाजे
हर रंग शोभे -सुन्दर -साजे
किलकारी से जग खिल जाए
तेज पर हारे त्रिपुरारी
उमा जाए बल -बल बलहारी
देव लोक फूलन बरसाए।
ठुमक -ठुमक चालत रघुराई
मंद -मंद कोसल मुस्काई
गिरत -परत -उठत रघुनन्दन
कनक पालिका में भाव भंजन
पवन देव झूला झुलाये।
खनक -खनक पायलिया बाजे
हर रंग शोभे -सुन्दर -साजे
किलकारी से जग खिल जाए
तेज पर हारे त्रिपुरारी
उमा जाए बल -बल बलहारी
देव लोक फूलन बरसाए।
हनन कर मान का हनुमान पाया है
खोल दो दरबार तुम्हरा दास आया है।
सफल सगल पूरन करते कारज तुम हनुमान
निश्चय प्रेम प्रतीति विनय करे सनमान।
तुम्हरे कारण ही राम का नाम पाया है...
लक्ष्मण के हूँ प्राण के दाता राम ने सीने से लगाया है
धु -धु दहन हो गयी लंका ,लंकेस्वर घभरया है।
संकट मोचन के होने से संकट कंप -कंपापया है
जड़बुद्धि को बल बुद्धि को पल तुम बदलते हो
विपता में हो भक्त तुम्हारे अतिविलम्ब ना करते हो
तुमको पाने को दासी ने गीत गाया है। ..
खोंटे से बंधे पालने में वह सो रही है,
फुसफुसाती बातों की निंदिया में खो रही है।
सितारों में उत्तम, तारों को मैं चुनती रहूँ,
मैं गाऊँगी गाथा, तुम बस सुनती रहो।
आरम्भ से आरम्भ करते हैं,
जब मनुष्य नामक प्राणी धरा पर उतरते हैं।
नर की रीढ़ से नारी बनती है,
शीतल, सौम्य, सुकुमारी लगती है।
युग-दर-युग बदलते हैं,
सुनें कैसे नर-नारी आगामी होकर बढ़ते हैं।
सौंप स्वयं को अग्नि में, सती स्वः करती है,
प्रेम के वेग से दहकती है।
दसों दिशाओं में रणविजय दशरथ बन जाते हैं,
जब साथ में रण पाटती कैकयी को पाते हैं।
हर पुरुष माँ के नाम से जाने जाते हैं,
जिनकी आँखों के आगे स्वयं सूर्य छुप जाते हैं।
हरण पर जिनके लंका फूँक दी जाती है,
दुशासन के रक्त से स्नान कर पाते हैं।
जहाँ यक्ष-गंधर्व-देव-त्रिदेव भी न कुछ कर पाते थे,
आवाहन कर देवी को वे बुलवाते हैं।
रणचंडी फिर उठ गुफाओं से निकलती है,
पाती है महिषासुर को, रक्तबीजों का पान करती है।
एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर के जब उन्हें थाम न पाते हैं,
वेग को संभालने स्वयं शंभू चरणों में आ जाते हैं।
परंतु अब मैं रवि का रथ खींच ला न पाती हूँ,
कैसे करूँ पार ये घाट, वर्तमान की सीढ़ियों पर ठहर मैं जाती हूँ।
मुझे भेड़ों के झुंड में बस भेड़िये दिखाई देते हैं,
घनघोर वन में मेमने की कर्कश किलकारियाँ सुनाई देती हैं।
कुकर्मों के आदि असुर सम्मुख आ जाते हैं,
वहशी गिद्ध बनकर वे नोच-नोच कर खाते हैं।
पर लाड़ली! सुनकर सब तुम सहम न जाना,
भय बसे तुममें, तुम इस वहम में न जाना।
तुम भगिनी हो मेरी, दमक-दमक गर्जना,
तुमसे ही तो है जग की सृजना।
प्रथम वंदना, नमन कर गाते हैं आरती तुम्हारी,
विचारों की वाणी हो तुम, बेचारी नहीं, नारी हो हमारी!
पवन के झूलों में तुम पा लो आकाश,
कामयाबी की सभा में हो तुम्हारा वास।
मैं हर रात्रि चमकते तारे चुनती रहूँ,
मैं गाती रहूँ और तुम सुनती रहो।
कपट की लकड़ियों से, कुल्हाड़ी को गढ़ा गया,
नीले शून्य आकाश में, तेज़ बिछोह लड़ा गया।
सह न पाए वार जब, हिमालय के कंधे बिखर गए,
इधर के उधर हुए लोग, और उधर के इधर गए।
ज़ख्मो को फाड़ती, हिंसा की धरा भर गई,
ज़मीन के हर टुकड़े पर, बँटवारे की नींव पड़ गई।
कटीली तारों से फिर, इन घावों की सिलाई हुई,
ऐंठे रहे सत्ताधीश, प्यादों से भरपाई हुई।
लहू की नदी में सवार, लाशों की नाव आई थी,
उजड़ गए थे घर, खंडर में तब्दील तन्हाई थी।
उखाड़ा गया आदमी को, जड़ें ज़मीन के साथ थीं,
बच्चे, औरतें, बेज़ुबान, क्या उनकी बिसात थीं?
जो थे राज के राजा, वे रस्ते के रंक हो गए,
तानाशाहों की जंग में, हम केवल एक अंक हो गए।
बेहद को सरहदों ने, एक हद में जकड़ लिया,
न जाने किस आपाधापी ने, इस वतन को पकड़ लिया।
कट गए, बँट गए, हम बँटते ही रह गए,
जी-जी कर भी ज़िंदगी में, मरते ही रह गए।
दृश्य देख यह, देव-दानव भी दंग थे,
लाल लहू में धुंधले, बचे-कूचे सब रंग थे।
वो महज़ लकीर नहीं, एक सिसकती हुई याद है,
पैंतालीस की दरिंदगी की, वो पक्की बुनियाद है।
कभी खामोशी भी इक गूँजती चीख बन जाती है,
जब दिल के भीतर दबे कोई तूफान होते हैं।
दुनिया समझती है कि सब सामान्य है बाहर,
मगर अंतस में कहीं सब लहू रोते हैं।
जिनके स्वप्न असमय ही सुप्त हो जाते हैं,
वहाँ अकाल की वीरानियाँ छा जाती हैं।
कतरन-कतरन आदमी खुद ही गलता जाता है,
जब स्मृतियाँ भीतर ही भीतर खा जाती हैं।
ऐसे खंडहर फिर 'अश्वथामा' सा शाप बन जाते हैं,
जलते हुए रुख, राख का ही भोजन पाते हैं।
पर फिर... तपोवन से प्रसन्न हो ऋतुराज आते हैं,
ऐरावत पर सवार, नई उमंगें जगाते हैं।
विरह के राग को त्याग, मल्हार के गीत सजते हैं,
सूखी-खोखली आँखों में फिर सलिल (जल) भरते हैं।
तम में तपते आसमान पर घनघोर घटा छाती है,
तपन बुझाने को कुदरत स्वयं उतर आती है।
किन्तु... विलम्ब से आए देवों का उत्साह अब दम तोड़ चुका,
आस की डोर थामे जो बैठा था, वो आस छोड़ चुका।
सब रंग बेरंग हुए, बस यादें ही हाथ आती हैं,
हम हाथ पर हाथ धरे, क्यों व्यर्थ पछताते हैं?
तुम चीख कर तोड़ दो मौन की ये फौलादी दीवारें,
पड़ने दो इन रूढ़िवादी बंधनों पर गहरी दरारें।
तुम स्वयंभू, तुम जगन्नाथ, कल्याण करो इस विश्व का,
त्याग दो अमरत्व का मोह, घूँट भरो अब विष का!
कह गए कोई व्यक्ति विशेष महान,
सत्य विचलित हो सकता, पर तजता नहीं स्थान।
पराजित भले न हो, पर होता है परेशां,
सुनो आज वृक्षों की व्यथा और उनकी दास्तां।
वातो-वृक्षों ने मिलकर फिर गुहार लगाई,
आज कुंज-वाटिका में एक पंचायत बिठाई।
सरपंच पीपल ने पंचों संग गंभीर विचार किया,
मनुष्य के दुर्व्यवहार का सबने मिलकर सार किया।
हम वसुधा की कोख के हैं असली लाल कहाते,
सलिल का भोजन पाते, अंबर तक हाथ बढ़ाते।
पवन-देव के अश्व हम, सूर्य का तेज पी जाते हैं,
प्राणवायु के दूत हम, जग का ताप मिटाते हैं।
भुजा हमारी सावन के झूले, हरित केश लहराते हैं,
पुष्प-गजरों से लदकर हम उपवन को महकाते हैं।
फलों का सेहरा माथे पर, जो सबका पोषण करता है,
पर मानव का लोभ सदा, इन प्राणों पर ही मरता है।
बैठे लोभी बेताल मनुज, हमें अपाहिज करते जाते हैं,
छील-काटकर देह हमारी, कंकाल बनाते जाते हैं।
चीखती हस्ती, चिंगारते गज, कौवे शोर मचाते हैं,
जब पावक की लपटों में ये, हमें भस्म कर जाते हैं।
शोक बरसता अंबर से, जब वन, वन नहीं रहता है,
बताओ इस अन्याय पे, मनुज का कानून क्या कहता है?
कभी मन्नतों के धागे बांध, हमें देव बताते हैं,
जी भरता है तो लालच में, कुल्हाड़ी चला गिराते हैं।
हमारे अंश से ही पले, न्याय के ये आलय हैं,
कानून की देवी के पन्ने, हमारे काष्ठ का ही आश्रय हैं।
क्या सत्य हार स्वीकार कर, मौन होकर बैठा है?
या न्याय का तराजू भी, अब स्वार्थ में ही पैठा है?
पुष्पों को जब भेदते हो, तब हारों के हार चढ़ते हैं,
हमें कुरेदकर ही तो, माथे के तिलक उभरते हैं।
सिलबट्टे पर पिसकर ही, रंग हिना का निखरता है,
कागज बनकर तन हमारा, अक्षरों को रूप धरता है।
सबसे पावन श्वास तुम्हारी, हमसे ही तो आती है,
पर विडम्बना देखो, हमारी लकड़ी ही तुम्हारी अर्थी सजाती है।
गर अब भी तुम न जागे, तो चिर-निद्रा में सोते रहना,
होगा जब अति-विलम्ब, तब हमसे कोई उलाहना न कहना।
मत कहना कि समय रहते, किसी ने तुम्हें बताया नहीं,
तुम्हारी लापरवाही के पालने को, किसी ने हिलाया नहीं।
उचित यही है, आज अभी से संरक्षण में जुड़ जाओ,
हम ही 'आधार' हैं तुम्हारे, हमें बचाकर स्वयं को बचाओ।
मेरी नीतियों की नींव पर, यह सारा विश्व बना है,
मैंने ही राजधर्म का, पावन ताना-बाना बुना है।
तर्क के पैने बाणों ने, कुरीतियों के सीने चीरे हैं,
मेरे पोषित शिष्य सदा ही, बनकर लौटे वीर हैं।
शास्त्रों में 'अर्थ' को समझाकर, लाभ-हानि का भेद बताया,
नियम रचे ऐसे कि कोई, मनमानी न कर पाया।
किन्तु आज के वर्तमान में, मैं अत्यंत उदास हूँ,
तर्कहीन, निरुद्देश्य खड़ा, मैं केवल रिक्त आभास हूँ।
यह भयावह दृश्य देख, मन मेरा सदा डराता है,
समाज की संकीर्णता से, साक्षात्कार करवाता है।
'कानन-न्याय' से चलती सत्ता, आज यहाँ जंगल राज है,
शक्ति के नखों से नोच रहा, निर्बल को लोभी बाज़ है।
किस 'हरि' का अब कहाँ यहाँ, कोई बस चलता है?
अंधेरे को निगलने वाला बालक, आज रोशनी को तरसता है।
विद्या पर प्रश्न उठते ही, पग मेरे डगमगाते हैं,
अज्ञानी भी गर्व से खुद को, मेरा वंशज बताते हैं।
सुनो शिक्षकों! मंथन करके, क्या तुम उत्तर दे पाओगे?
छैनी और हथौड़े से, क्या नया नायक गढ़ पाओगे?
अज्ञानता के पर्वतों को काटकर, ज्ञान का रण बनाना है,
स्वयं उतरकर कीचड़ में, तुम्हें 'राजीव' खिलाना है।
वरना इन बाल-मस्तिष्कों को, स्वार्थ की दीमक लग जाएगी,
शून्यता का भोजन पाकर, यह पीढ़ी पंगु हो जाएगी।
दर्पण में क्या तुम अपनी, असली सीरत पहचानोगे?
मिथ्या मान-प्रतिष्ठा के, पर्दे कब तुम त्यागोगे?
अब भी बने रहे 'धृतराष्ट्र', तो घनघोर पाप करोगे,
जब लेखा होगा कर्मों का, तब कहाँ पश्चाताप करोगे?
'विद्यासागर' होने का, व्यर्थ न तुम अहंकार करो,
बनकर मेरे सच्चे वंशज, युवाओं में वैचारिक हुंकार भरो।
तुम सखा बनो, तुम पिता बनो, तुम मार्गदर्शक मीत बनो,
शंकाओं का जो दहन करे, तुम वो प्रज्वलित अग्नि-गीत बनो।
तुम्हारे कौशल से सिंचित, हर नर और नारी हो,
आत्मविश्वास से पूर्ण रहें, न लेशमात्र लाचारी हो।
तुम 'वशिष्ठ' बन मानव को, 'पुरुषोत्तम' बना सकते हो,
'परशुराम' बन शून्य को भी, 'शतकोटि' कर सकते हो।
अब यह चाणक्य विदा लेकर, तुमसे एक प्रण लेता है,
जाने से पूर्व अंतिम वचन, तुम शिक्षकों से कहता है—
यदि अपनी प्रतिभा और सामर्थ्य को, तुम व्यर्थ जाने दोगे,
तो भीषण अपराध करोगे, अनर्थ को अर्थ बनने दोगे!
कलम को अपनी शस्त्र बनाओ, नया इतिहास रचा देना,
उठो कि राष्ट्र के माथे पर, तुम ज्ञान का तिलक लगा देना।