Monday, December 8, 2025

Sher - ae -Punjab


शेर-ए-पंजाब जो जीतते हर रण को,

हस्तियों पर सवार, कुचलते दुश्मनों के फण को।


जिनके जन्म पर शोक मनाया था जहाँ ने कभी,

माता राज कौर की कोख से वही महाराजा अवतरित हुआ तभी।


जिनकी दृष्टि से पाषाण भी पारस बन जाता था,

जो निकट आते, हर दिल उनका मुरीद बन जाता था।


भेद-भाव के पठारों को समतल कर डाला उन्होंने,

मानवता की भूमि पर न्याय का दीपक जला दिया उन्होंने।


अपनी गागर तोड़ सागर को नापा जिसने,

जहाँ रखे पग, वहीं "खालसा फ़तेह" का जयघोष हुआ गगन में।


बेर के कंकड़ खाकर भी मंद-मंद मुस्काते थे,

अकाल पद जाते हुए, निर्धन जन के घर राशन रख आते थे।


युद्ध में उतर कर वीरता की मिसाल गढ़ जाते थे,

अकाल की रज़ा में रमे, "वहिगुरु जी का खालसा" कह सो निहाल हो जाते थे।


कलगीधर का लाड़ला, लोक-प्रीय वो राजा प्यारा था,

स्वयं को तुच्छ मान, सदा खालसा का रखवाला था।


पंजाब की हर दिशा धम्मियों से गुंजित थी,

“राज करेगा खालसा” हर राह पर अंकित थी।


त्रुटि होने पर वह क्षण में नतमस्तक हो जाता था,

अकाली फूल्ला सिंह के चरणों में गिर पड़ता था।


हरी सिंह की हुंकार से अफ़गान काँप उठते थे,

शेर-ए-पंजाब के नाम से गोरे भी थर्रा उठते थे।


बारात में सोने-चांदी लुटाते थे वे उदार,

संग ही टक्साली राशि का लंगर करते थे तैयार।


ऐसे लाल जब वसुधा की गोद में समा जाते हैं,

तो भारतीय होने का गौरव और बढ़ाते हैं।


श्रोताओं! गर्व करो अपने इतिहास के स्वर्णिम प्रकाश पर,

रहे ये स्मरण हमारे अंतिम श्वास तक।


एक चिंगारी है यह — जो बढ़ती जाएगी,

देशप्रेम की लहर हर हृदय तक पहुँच जाएगी।

Sahib -ae-Kamaal

 कैसे गाएँ हम आरती साहिब -ऐ -कमाल की 

भेंट दिया जिसने सर्वस्व, ऐसी वसुधा के लाल की।


पुत्र से लेकर पिता तक सभी को वारा था 

आस्था उसकी अटल रही कभी न हारा था।  


ऐसी दिव्य ज्योति प्रकट हुई माता गंगा  की कोख से,

जो परे रही सुख-दुःख, हर विनोद और शोक से।


कश्मीरी पंडितों की पीड़ा पर जो मौन त्याग कर  बोले थे 

वचन सुनाकर सत्य के, सिंहासन और सभा सभी डोले थे ।


पिता के शीश का गौरव गोविन्द ने गाकर बखाना,

शीश दिया पर धर्म बचाया, ऊँचा रखा तराना।


जिन्होंने चिड़ियों के संग बाज को लड़ाया था 

 कलगीधर गुरु गोविन्द सिंह जगत में कहलाया था।  


विरह में भी जो मुरीदों का हाल तरानों में गाते थे,

अकाल की रज़ा में रहते वो कभी न घभराते थे।  


कैसी वो चमकौर की गड़ी थी 

जहाँ जान आफतों में पड़ी थी।  


सियारों ने सिंहों को  छल -कपट से मारा था 

वहां  बड़े साहिबज़ादों का सहस दहाड़ा था। 


और छोटे साहिबज़ादे भी किससे तनिक कम थे,

माता गुजरी संग धर्म हेठ खड़े वो हर दम थे।  


बैसाखी के पावन दिन पर खालसा-पंथ सजाया था 

शीश नवा कर गुरु गोविन्द आपे गुरचेला कहाया था।  


अकाल की आज्ञा से ग्रन्थ को गुरु का नाम दिया 

“धर्म सदा सर्वोपरि” विश्व में यही पैगाम दिया।  


जहाँ-जहाँ चरण-रज गिरी उनके, वह धरा तीर्थ बन जाएगी,

हे गोविन्द सिंह! तेरी गौरव-गाथा युगों-युगों तक गाई जाएगी।


 कैसे गाएँ हम आरती साहिब -ऐ -कमाल की 

भेंट दिया जिसने सर्वस्व, ऐसी वसुधा के लाल की।

Tuesday, September 23, 2025

Laghu Ramayana

 

दशरथ के घर चार सुत आए,

राम, लखन, भरत, शत्रुघ्न नाम कहलाए।


तारका को मार गिराया,

तोड़ पिनाकी, जानकी को ब्याहा।


कैकेयी ने मन में विष घोला,

दशरथ के वचन को पूरा किया।

भरत को राज-पाठ दिलाया,

राम ने १४ वर्ष का वनवास पाया।


लखन और जानकी संग में,

राम चले अब उपवन में।


आई शूर्पणखा भेस बदल कर,

गई नाक कटी, रोती रावण के दर पर।


दशानन ने रौद्र रूप दिखाया,

हरण कर सिया को लंका ले आया।


हनुमंत ने भेंट कराई,

सुग्रीव को राजगद्दी दिलाई।


लंका दहन कर बजरंगी आए,

सीता माँ का विरह सुनाए।


सागर में नल-नील ने रास्ता बनाया,

राम नाम से पत्थर भी तैरकर आया।


कुंभकरण-मेघनाद को संहारा,

अंत में लंकेश्वर को ललकारा।


नाभि में जब बाण चलाया,

घर के भेदी ने लंका को ढहाया।


रावण का अंत करके प्रभु राम आए,

अयोध्या में फिर से खुशियाँ लाए।

सत्य की विजय हुई, धर्म फिर स्थापित हुआ,

राम राज्य का ऐसा महात्म्य है, जो हर युग में गाया जाता रहा।


Thursday, September 18, 2025

Shabadon ka Shilpkaar

बुलाया गया है उस शब्दों के शिल्पकार को,

जो तराशता  है रूप, भाव निराकार को।


थाली सजाई उसने दीपों, चंदन, और पुष्पों में भी नमी रही 

फिर भी रूठे रहे देवता, ना जाने क्या कमी रही।


वर्णों से लदी थी वैजयंती माला,

ध्वनि के खड़ताल को खरताला।


मौन को पीस-पीस कर विचारों का तिलक बनाया,

कल्पना की बांधनी से ओढ़नी को रंगाया।


अनुप्रास में आभास मिश्रित कर आभूषण विभूषित हुए,

रूपक के श्रृंगार से देवता और सुशोभित हुए।


यमक, श्लेषा, वीप्सा, अतिशयोक्ति व उपमा के  पंचामृत से अभिषेक हुआ,

मंद-मंद मुस्कुराए कान्हा, कहीं प्रसन्न महेश हुआ।


ये शब्द वंश के हरकारे,

साहित्य की संतान हैं

इनकी लेखनी के व्याल, विष-अमृत हुंकारे,

भाषा का अभिमान हैं।


इनके चिंतन के कलश में अखिल ज्ञान समाया है 

इनकी वाणी से विवश हो ईश्वर स्वयं भू उतर आया है।  


मन की गति पर सवार पार रवि के वो जा सकते हैं,

जो अविस्मरणीय है, उसे सरल कर सामने तुम्हारे ला सकते हैं।


अंतर में एक कुटुंब बसाकर अपने में ही रहते हैं,

शायद इसी कारण लोग उन्हें पागल-पागल कहते हैं।


प्रतिबिंब है ये सत्य का, समक्ष इनके सब चमकता है,

विधाता के छैनी-हथौड़े से गढ़े, कोई विरला ही कवि बन सकता है।


जीवित रहकर सृष्टि के कानन में अदृश्य होते जाते है, 

विख्यात होते हैं जब निर्जीव  खंडहर बन ये  जाते हैं।





Wednesday, May 14, 2025

My Cherished Abode

Moulded deep in earth's embrace,

Where magicians, with a mystic grace,

Trick the soil, a golden hoard,

By ancient wonder, richly poured.


Where artists bold, with hues so bright,

The towering landscapes guard with light,

With strokes of offering, colours fly,

Beneath the vast and watchful sky.


Like kaleidoscopic fabrics spun,

Where countless voices have begun,

A vibrant weave of tongue and art,

That beats within this land's own heart.


A flavour deep, a spiced delight,

Where wisdom blooms in herbal might,

Philosophic scents arise,

Beneath the ancient, knowing skies.


With progress fresh, a verdant gleam,

A diverse tapestry, life's bright dream,

And love and kinship, a strong tie,

Where spirits meet beneath one sky.


These are the roots that hold me fast,

The ancient echoes of the past.

But wings unfold, on modern breeze,

With hope and unity, at ease.


This land, my own, where dreams take flight,

From heritage to future bright,

My cherished home, where spirits free,

Holds timeless meaning unto me.

Monday, April 28, 2025

Main Jal Hoon

पंचतत्वों का मैं नायक हूँ

कभी सौम्य हूँ मैं कभी रौद्र रूप भायक हूँ।


खल-खल कर मेरा सुर बहता है

मुझ में जीवन फूटता-फलता रहता है।


मेरा रंग, वर्ण, रूप नहीं है

प्रतिबिम्ब हूँ मैं प्रकृति का, मेरा कोई प्रारूप नहीं है।


अभिशाप-वरदान का अर्क मैं बन जाता हूँ

जब-जब तपस्वियों के कुंडल में समाता हूँ।


वेदों की अमित वाणी मैं हूँ

संकल्पों की कहानी मैं हूँ।


मुझे मथने भर से सम्पूर्ण देवलोक हर्षाया था

कुम्भ के त्यौहार में मैंने हे अमृत बरसाया था।


शिव के कुंतील की कान्ति मैं हूँ

ध्यान में बैठे योगी की शांति मैं हूँ।


निष्कर्ष हूँ मैं भगीरथ के व्रत का

सार्थी हूँ मैं भागीरथी के रथ का।


मेरे तट पर बैठ कन्हैया मुरली की धुन सुनाते हैं

तिरंगे बनाकर कालिंदी में तीनों लोकों तक पहुँचाते हैं।


अति विषम कार्य वो भी महान हुआ है

मेरी पृष्ठ पर हे तो राम सेतु का निर्माण हुआ।


ज़म-ज़म के पाक पानी में मैं हूँ

खालसा पंथ की खालिस निशानी में मैं हूँ।


मैं कभी तो बांध तोड़ कर आता हूँ

सब कुछ बहा ले जाता हूँ।


और कभी दर्शन मेरे दुर्लभ हो जाते हैं

फिर हाय सब सूखे नीर बहाते हैं।


वर्तमान में मेरे ग्रह टकरा रहे हैं

चहुँओर केवल राहु-केतु दिखाई आ रहे हैं।


मैं विलुप्त होने की कगार पर हूँ

मुझे सम्भालो, मैं अंतिम गुहार पर हूँ।


तुम अभी बैठे हो न जाने किस आस पर

हे मानव उठ, मेरी अस्मिता को बचाने का प्रयास कर।


तुम अब भी इस पहेली को बुझ रहे हो

मैं कौन हूँ? अब तक यही खोज रहे हो।


मैं नीर, सलिल, अम्बु, पय, जल हूँ

सचेत रहो मानुष, मैं तुम्हारा कल, आज और कल हूँ।



Saturday, March 22, 2025

Jatayu and Sampati

 

माता की आँखों के दो तारे थे,

जिनमें पलते-बढ़ते उनके स्वप्न सारे थे।


यूँ तो वो बनते-बिगड़ते थे,

पर निपुण निर्भीक थे, संकटों से ना डरते थे।


जब भी स्नेह माता का बँटता था,

कनिष्ठ की झोली में कुछ अधिक ही गिरता था।


ज्येष्ठ को ये कदापि ना भाता था,

पर क्या करे, घर का लाडला था न' उनका छोटा भ्राता था।


कनिष्ठ के निश्चय सम्मुख नक्षत्र, सूर्य, चंद्र, ब्रह्माण्ड झुक जाते थे,

उसको प्रसन्न करने के लिए सभी एड़ी-चोटी का जोर लगाते थे।


कभी तो माता ने सूर्य निगलने वाली कथा सुनाई थी,

कैसे बाल हनुमान की लीला से तीनों लोकों में विपदा आई थी।


वानर होकर जब हनुमान छलांग सूर्य तक लगा सकते हैं,

हम फिर भी पक्षी हैं, सौरमंडल की परिक्रमा कर आ सकते हैं।


जटायु की नीति सुनकर सम्पाती चौंक उठे थे,

ना सुनने पर कनिष्ठ भी मुख लटकाए रूठे थे।


चमकी बुद्धि और एक बात सूझी,

क्यों ना उड़े गगन पार दोनों अनुज।


निकटतम से भी निकट जो पहुँच जाएगा,

बस वही इस स्पर्धा का विजेता कहलाएगा।


पक्षीराज थे सम्पाती, पर भ्रातृप्रेम को टाल ना पाते थे,

छाया बनकर सभी विघ्नों को पार जाते थे।


संग उड़ेंगे तो ध्यान भी रख पाएंगे,

यदि सहसा आन पड़ी कोई आपदा तो काबू कर पाएंगे।


देखते ही देखते पृथ्वी छोटी होती जाती थी,

चमकता लाल सूर्य देखकर कनिष्ठ की लालसा बढ़ती जाती थी।


पवन की गति पर सवार सम्पाती तेज सूर्य का पी जाते हैं,

टुकड़े-टुकड़े बचते हैं पंख, कुछ आधे जल जाते हैं।


अंतिम अनंत गगन में पंख फैलाए सम्पाती जैसे-तैसे कर भू पर लौट आते हैं,

कनिष्ठ को सही सलामत देख फूले न समाते हैं।


खोया तेजस अपने ज्येष्ठ का, जटायु गिर चरणों पर बस समर्पण कर पाए थे,

रोते हुए कनिष्ठ को देख कर सम्पाती मुस्कुराए थे।


उठो वत्स, क्या हुआ जो हम अब उड़ ना पाएंगे?

तुम प्राण हो, तुम्हारे लिए एक क्या, हम षट्कोटि सूर्य सह जाएंगे।


कलि के काल में प्रेम भाई-भाई का लुप्त होने लगा है,

पारदर्शी नहीं रहे संबंध, सब गुप्त होने लगा है।


पल रही पीढ़ी को समय रहते रिश्तों के मायने समझाओ,

प्रिय श्रोताओं, वैर अपनों के बीच से मिटाओ।