Monday, March 9, 2026

Krodh



युगों-युगों से शोध का हम, विषय गहन बन जाते हैं,

जो हर ले विवेक की आभा, हम 'क्रोध' वही कहलाते हैं।

भ्रष्ट करे जो बुद्धि मनुज की, वह प्रखर प्रणाम हमारा है,

संहार की लपटों में लिपटा, अस्तित्व ये जग से न्यारा है।


हमारे तेज से ही तो, आशुतोष 'रुद्र' बन जाते,

काम की वासना भस्म कर, हम ही 'शिव' को जगाते।

जब सौम्य गौरी पहन चंडी का, विकराल वसन आ जाती हैं,

रक्तबीज का रक्त चूस कर, असुरों को धूल चटाती हैं।


हम मौन भाव के कुंभकरण, शांत शून्य में सुप्त पड़े,

पर जब पालना हिले व्यवस्था का, हम तब विनाश बन खड़े।

कु-कर्मों की कालिख पोत कर, प्रतिशोध का हम रूप धरते,

स्वर्ण नहीं, कोयला बनकर, हम स्वयं दहन में जलते।


जब लोभ-मोह के सर्प हमें, कसकर स्वयं में लपेटते,

पाप के वृश्चिक तड़प कर, हम ही की ओर घसीटते।

हमारी सुर्ख लालिमा पर, जब अज्ञान की धूल जम जाती,

तब मर्यादा की सीमा लांघ, हम पाताल तक उतर जाती।


अक्सर मनुष्य डरा क्यों करता, हमारे इस प्रलय स्वरूप से?

अंधकार में हमें दबाकर, छुपता है क्यों वो स्व-रूप से?

पर वीर गाथाओं के हम ही, प्रेरक भाव बन जाते,

जटायु का बलिदान देख, हम ही प्रभु की गोद दिलाते।


भीष्म की प्रतिज्ञा का आधार, हम ही तो कहलाते,

अन्याय देख जो उठ खड़ा हो, हम वही शक्ति बन जाते।

उपेक्षित कर हमें हृदय में, बाद में जो आप उफनते,

वही विष बन कर अंतस में, नीलकंठ से भी न पचते।


स्वीकारो कि भावनाओं के, हम भी अभिन्न अंश हैं,

विरह की टीस में दर्द बनकर, हम भी निष्ठुर वंश हैं।

कुचल हमें जो बढ़ोगे आगे, राह का काँटा बन जाएंगे,

सँभाल लो हमें विवेक से, हम 'सहस्त्रबाहु' बन जाएंगे।


भिन्न-भिन्न है भावनाएँ, भिन्न-भिन्न है ज्ञान,

क्रोध भी है एक शक्ति, दीजिए इसको सम्मान।





Tuesday, March 3, 2026

NavDurga

 शैलसुता कल-कल निनाद कर उतरती,

मृदुल कलरव से मानस हर्षित करती।

(प्रथम: शैलपुत्री)


श्वेत वसना, तप-आचरण पावन जिनका,

ब्रह्मचारिणी हरतीं संताप जन-जन का।

(द्वितीय: ब्रह्मचारिणी)


चंद्र-घंटिका करती गुंजित मधुर छन-छन,

दिव्य आभा से जुड़ता भक्तिमय अंतर्मन।

(तृतीय: चंद्रघंटा)


कुश-अंश से मांडतीं जो इस धरा को,

कुष्मांडा जीवंत करतीं चराचर जगत को।

(चतुर्थ: कुष्मांडा)


वात्सल्य की अमृत-धार जो पिलाती हैं,

स्कंदमाता ही ममता का सार सिखाती हैं।

(पंचम: स्कंदमाता)


कुकर्मों का मर्दन करतीं माँ कात्यायनी,

रक्तबीज-संहारिणी, दुष्ट-दल-दामिनी।

(षष्ठ: कात्यायनी)


काल-कपाल पर जो तांडव रचती हैं,

असुर-विनाशिनी वही कालरात्रि बनती हैं।

(सप्तम: कालरात्रि)


कोटि सूर्यों का तेज सौम्यता में समाया है,

महागौरी ने शुचि पावन रूप पाया है।

(अष्टम: महागौरी)


सुमति तराशकर जो श्रेष्ठ बुद्धि बनाती हैं,

सिद्धिदात्री ही सिद्धियों से अस्मिता सजाती हैं।

(नवम: सिद्धिदात्री)


नवगुण-धारिणी भवानी जग-रखवाली है,

हृदय को मंदिर बना, घर मेरे आने वाली है।

Tuesday, February 17, 2026

Shiv Kaise hai?

 कैलाश की अविचल जटाओं की जटिल गाँठें हैं,

स्थिर जहाँ जान्हवी, शशि-किरण को बाँधे हैं।


नेत्रों में मात्र निखिल सृजन झूलता है,

त्रिनेत्र खुलें जब, प्रलय ही उफनता है।


नासिका का श्वास-वेग जीवन की सरिता है,

निरंतर काल जिनका राम-नाम में रमता है।


अतिशयोक्ति, अनुप्रास, उपमा सब तुच्छ छोटी हैं,

उनके समक्ष, जो शून्य से शतकोटि हैं।


नीलकंठ की महिमा का कितना विस्तार दूँ?

क्या-क्या अपनी लेखनी से पन्नो पर  उतार दूँ?


कंठ के आभूषण सुशोभित विष और भुजंग हैं,

भस्म की रज से रमे अंग-प्रत्यंग हैं।


मुंडमाल सजे त्रिलोकीनाथ, वही त्रिपुरारी हैं,

हाथ में त्रिशूल सोहे, वृषभ की सवारी है।


डगमग चाल से भूचाल आ जाता है,

तांडव देख जिनके, महाकाल काँप जाता है।


गौरीश जिनकी महिमा अविरल गाते हैं,

देवों के देव, मात्र अंजलि-जल से प्रसन्न हो जाते हैं।


हर युग के राम के बजरंग आप ही रहेंगे,

'शिव सदा सहायते' हम यही कहेंगे।


विनती लघु सी, चरणों में शरण मिल जाएगी,

टल जाएँगी विपदा, भव-बाधा मिट जाएगी।


तुच्छ मेरी याचना, तुच्छ मेरा कहना है,

छाया बन क्षण-क्षण, संग प्रभु रहना है।

 

Monday, December 8, 2025

Sher - ae -Punjab


शेर-ए-पंजाब जो जीतते हर रण को,

हस्तियों पर सवार, कुचलते दुश्मनों के फण को।


जिनके जन्म पर शोक मनाया था जहाँ ने कभी,

माता राज कौर की कोख से वही महाराजा अवतरित हुआ तभी।


जिनकी दृष्टि से पाषाण भी पारस बन जाता था,

जो निकट आते, हर दिल उनका मुरीद बन जाता था।


भेद-भाव के पठारों को समतल कर डाला उन्होंने,

मानवता की भूमि पर न्याय का दीपक जला दिया उन्होंने।


अपनी गागर तोड़ सागर को नापा जिसने,

जहाँ रखे पग, वहीं "खालसा फ़तेह" का जयघोष हुआ गगन में।


बेर के कंकड़ खाकर भी मंद-मंद मुस्काते थे,

अकाल पद जाते हुए, निर्धन जन के घर राशन रख आते थे।


युद्ध में उतर कर वीरता की मिसाल गढ़ जाते थे,

अकाल की रज़ा में रमे, "वहिगुरु जी का खालसा" कह सो निहाल हो जाते थे।


कलगीधर का लाड़ला, लोक-प्रीय वो राजा प्यारा था,

स्वयं को तुच्छ मान, सदा खालसा का रखवाला था।


पंजाब की हर दिशा धम्मियों से गुंजित थी,

“राज करेगा खालसा” हर राह पर अंकित थी।


त्रुटि होने पर वह क्षण में नतमस्तक हो जाता था,

अकाली फूल्ला सिंह के चरणों में गिर पड़ता था।


हरी सिंह की हुंकार से अफ़गान काँप उठते थे,

शेर-ए-पंजाब के नाम से गोरे भी थर्रा उठते थे।


बारात में सोने-चांदी लुटाते थे वे उदार,

संग ही टक्साली राशि का लंगर करते थे तैयार।


ऐसे लाल जब वसुधा की गोद में समा जाते हैं,

तो भारतीय होने का गौरव और बढ़ाते हैं।


श्रोताओं! गर्व करो अपने इतिहास के स्वर्णिम प्रकाश पर,

रहे ये स्मरण हमारे अंतिम श्वास तक।


एक चिंगारी है यह — जो बढ़ती जाएगी,

देशप्रेम की लहर हर हृदय तक पहुँच जाएगी।

Sahib -ae-Kamaal

 कैसे गाएँ हम आरती साहिब -ऐ -कमाल की 

भेंट दिया जिसने सर्वस्व, ऐसी वसुधा के लाल की।


पुत्र से लेकर पिता तक सभी को वारा था 

आस्था उसकी अटल रही कभी न हारा था।  


ऐसी दिव्य ज्योति प्रकट हुई माता गंगा  की कोख से,

जो परे रही सुख-दुःख, हर विनोद और शोक से।


कश्मीरी पंडितों की पीड़ा पर जो मौन त्याग कर  बोले थे 

वचन सुनाकर सत्य के, सिंहासन और सभा सभी डोले थे ।


पिता के शीश का गौरव गोविन्द ने गाकर बखाना,

शीश दिया पर धर्म बचाया, ऊँचा रखा तराना।


जिन्होंने चिड़ियों के संग बाज को लड़ाया था 

 कलगीधर गुरु गोविन्द सिंह जगत में कहलाया था।  


विरह में भी जो मुरीदों का हाल तरानों में गाते थे,

अकाल की रज़ा में रहते वो कभी न घभराते थे।  


कैसी वो चमकौर की गड़ी थी 

जहाँ जान आफतों में पड़ी थी।  


सियारों ने सिंहों को  छल -कपट से मारा था 

वहां  बड़े साहिबज़ादों का सहस दहाड़ा था। 


और छोटे साहिबज़ादे भी किससे तनिक कम थे,

माता गुजरी संग धर्म हेठ खड़े वो हर दम थे।  


बैसाखी के पावन दिन पर खालसा-पंथ सजाया था 

शीश नवा कर गुरु गोविन्द आपे गुरचेला कहाया था।  


अकाल की आज्ञा से ग्रन्थ को गुरु का नाम दिया 

“धर्म सदा सर्वोपरि” विश्व में यही पैगाम दिया।  


जहाँ-जहाँ चरण-रज गिरी उनके, वह धरा तीर्थ बन जाएगी,

हे गोविन्द सिंह! तेरी गौरव-गाथा युगों-युगों तक गाई जाएगी।


 कैसे गाएँ हम आरती साहिब -ऐ -कमाल की 

भेंट दिया जिसने सर्वस्व, ऐसी वसुधा के लाल की।

Tuesday, September 23, 2025

Laghu Ramayana

 

दशरथ के घर चार सुत आए,

राम, लखन, भरत, शत्रुघ्न नाम कहलाए।


तारका को मार गिराया,

तोड़ पिनाकी, जानकी को ब्याहा।


कैकेयी ने मन में विष घोला,

दशरथ के वचन को पूरा किया।

भरत को राज-पाठ दिलाया,

राम ने १४ वर्ष का वनवास पाया।


लखन और जानकी संग में,

राम चले अब उपवन में।


आई शूर्पणखा भेस बदल कर,

गई नाक कटी, रोती रावण के दर पर।


दशानन ने रौद्र रूप दिखाया,

हरण कर सिया को लंका ले आया।


हनुमंत ने भेंट कराई,

सुग्रीव को राजगद्दी दिलाई।


लंका दहन कर बजरंगी आए,

सीता माँ का विरह सुनाए।


सागर में नल-नील ने रास्ता बनाया,

राम नाम से पत्थर भी तैरकर आया।


कुंभकरण-मेघनाद को संहारा,

अंत में लंकेश्वर को ललकारा।


नाभि में जब बाण चलाया,

घर के भेदी ने लंका को ढहाया।


रावण का अंत करके प्रभु राम आए,

अयोध्या में फिर से खुशियाँ लाए।

सत्य की विजय हुई, धर्म फिर स्थापित हुआ,

राम राज्य का ऐसा महात्म्य है, जो हर युग में गाया जाता रहा।


Thursday, September 18, 2025

Shabadon ka Shilpkaar

बुलाया गया है उस शब्दों के शिल्पकार को,

जो तराशता  है रूप, भाव निराकार को।


थाली सजाई उसने दीपों, चंदन, और पुष्पों में भी नमी रही 

फिर भी रूठे रहे देवता, ना जाने क्या कमी रही।


वर्णों से लदी थी वैजयंती माला,

ध्वनि के खड़ताल को खरताला।


मौन को पीस-पीस कर विचारों का तिलक बनाया,

कल्पना की बांधनी से ओढ़नी को रंगाया।


अनुप्रास में आभास मिश्रित कर आभूषण विभूषित हुए,

रूपक के श्रृंगार से देवता और सुशोभित हुए।


यमक, श्लेषा, वीप्सा, अतिशयोक्ति व उपमा के  पंचामृत से अभिषेक हुआ,

मंद-मंद मुस्कुराए कान्हा, कहीं प्रसन्न महेश हुआ।


ये शब्द वंश के हरकारे,

साहित्य की संतान हैं

इनकी लेखनी के व्याल, विष-अमृत हुंकारे,

भाषा का अभिमान हैं।


इनके चिंतन के कलश में अखिल ज्ञान समाया है 

इनकी वाणी से विवश हो ईश्वर स्वयं भू उतर आया है।  


मन की गति पर सवार पार रवि के वो जा सकते हैं,

जो अविस्मरणीय है, उसे सरल कर सामने तुम्हारे ला सकते हैं।


अंतर में एक कुटुंब बसाकर अपने में ही रहते हैं,

शायद इसी कारण लोग उन्हें पागल-पागल कहते हैं।


प्रतिबिंब है ये सत्य का, समक्ष इनके सब चमकता है,

विधाता के छैनी-हथौड़े से गढ़े, कोई विरला ही कवि बन सकता है।


जीवित रहकर सृष्टि के कानन में अदृश्य होते जाते है, 

विख्यात होते हैं जब निर्जीव  खंडहर बन ये  जाते हैं।