शैलसुता कल-कल निनाद कर उतरती,
मृदुल कलरव से मानस हर्षित करती।
(प्रथम: शैलपुत्री)
श्वेत वसना, तप-आचरण पावन जिनका,
ब्रह्मचारिणी हरतीं संताप जन-जन का।
(द्वितीय: ब्रह्मचारिणी)
चंद्र-घंटिका करती गुंजित मधुर छन-छन,
दिव्य आभा से जुड़ता भक्तिमय अंतर्मन।
(तृतीय: चंद्रघंटा)
कुश-अंश से मांडतीं जो इस धरा को,
कुष्मांडा जीवंत करतीं चराचर जगत को।
(चतुर्थ: कुष्मांडा)
वात्सल्य की अमृत-धार जो पिलाती हैं,
स्कंदमाता ही ममता का सार सिखाती हैं।
(पंचम: स्कंदमाता)
कुकर्मों का मर्दन करतीं माँ कात्यायनी,
रक्तबीज-संहारिणी, दुष्ट-दल-दामिनी।
(षष्ठ: कात्यायनी)
काल-कपाल पर जो तांडव रचती हैं,
असुर-विनाशिनी वही कालरात्रि बनती हैं।
(सप्तम: कालरात्रि)
कोटि सूर्यों का तेज सौम्यता में समाया है,
महागौरी ने शुचि पावन रूप पाया है।
(अष्टम: महागौरी)
सुमति तराशकर जो श्रेष्ठ बुद्धि बनाती हैं,
सिद्धिदात्री ही सिद्धियों से अस्मिता सजाती हैं।
(नवम: सिद्धिदात्री)
नवगुण-धारिणी भवानी जग-रखवाली है,
हृदय को मंदिर बना, घर मेरे आने वाली है।