युगों-युगों से शोध का हम, विषय गहन बन जाते हैं,
जो हर ले विवेक की आभा, हम 'क्रोध' वही कहलाते हैं।
भ्रष्ट करे जो बुद्धि मनुज की, वह प्रखर प्रणाम हमारा है,
संहार की लपटों में लिपटा, अस्तित्व ये जग से न्यारा है।
हमारे तेज से ही तो, आशुतोष 'रुद्र' बन जाते,
काम की वासना भस्म कर, हम ही 'शिव' को जगाते।
जब सौम्य गौरी पहन चंडी का, विकराल वसन आ जाती हैं,
रक्तबीज का रक्त चूस कर, असुरों को धूल चटाती हैं।
हम मौन भाव के कुंभकरण, शांत शून्य में सुप्त पड़े,
पर जब पालना हिले व्यवस्था का, हम तब विनाश बन खड़े।
कु-कर्मों की कालिख पोत कर, प्रतिशोध का हम रूप धरते,
स्वर्ण नहीं, कोयला बनकर, हम स्वयं दहन में जलते।
जब लोभ-मोह के सर्प हमें, कसकर स्वयं में लपेटते,
पाप के वृश्चिक तड़प कर, हम ही की ओर घसीटते।
हमारी सुर्ख लालिमा पर, जब अज्ञान की धूल जम जाती,
तब मर्यादा की सीमा लांघ, हम पाताल तक उतर जाती।
अक्सर मनुष्य डरा क्यों करता, हमारे इस प्रलय स्वरूप से?
अंधकार में हमें दबाकर, छुपता है क्यों वो स्व-रूप से?
पर वीर गाथाओं के हम ही, प्रेरक भाव बन जाते,
जटायु का बलिदान देख, हम ही प्रभु की गोद दिलाते।
भीष्म की प्रतिज्ञा का आधार, हम ही तो कहलाते,
अन्याय देख जो उठ खड़ा हो, हम वही शक्ति बन जाते।
उपेक्षित कर हमें हृदय में, बाद में जो आप उफनते,
वही विष बन कर अंतस में, नीलकंठ से भी न पचते।
स्वीकारो कि भावनाओं के, हम भी अभिन्न अंश हैं,
विरह की टीस में दर्द बनकर, हम भी निष्ठुर वंश हैं।
कुचल हमें जो बढ़ोगे आगे, राह का काँटा बन जाएंगे,
सँभाल लो हमें विवेक से, हम 'सहस्त्रबाहु' बन जाएंगे।
भिन्न-भिन्न है भावनाएँ, भिन्न-भिन्न है ज्ञान,
क्रोध भी है एक शक्ति, दीजिए इसको सम्मान।