Monday, December 8, 2025

Sahib -ae-Kamaal

 कैसे गाएँ हम आरती साहिब -ऐ -कमाल की 

भेंट दिया जिसने सर्वस्व, ऐसी वसुधा के लाल की।


पुत्र से लेकर पिता तक सभी को वारा था 

आस्था उसकी अटल रही कभी न हारा था।  


ऐसी दिव्य ज्योति प्रकट हुई माता गंगा  की कोख से,

जो परे रही सुख-दुःख, हर विनोद और शोक से।


कश्मीरी पंडितों की पीड़ा पर जो मौन त्याग कर  बोले थे 

वचन सुनाकर सत्य के, सिंहासन और सभा सभी डोले थे ।


पिता के शीश का गौरव गोविन्द ने गाकर बखाना,

शीश दिया पर धर्म बचाया, ऊँचा रखा तराना।


जिन्होंने चिड़ियों के संग बाज को लड़ाया था 

 कलगीधर गुरु गोविन्द सिंह जगत में कहलाया था।  


विरह में भी जो मुरीदों का हाल तरानों में गाते थे,

अकाल की रज़ा में रहते वो कभी न घभराते थे।  


कैसी वो चमकौर की गड़ी थी 

जहाँ जान आफतों में पड़ी थी।  


सियारों ने सिंहों को  छल -कपट से मारा था 

वहां  बड़े साहिबज़ादों का सहस दहाड़ा था। 


और छोटे साहिबज़ादे भी किससे तनिक कम थे,

माता गुजरी संग धर्म हेठ खड़े वो हर दम थे।  


बैसाखी के पावन दिन पर खालसा-पंथ सजाया था 

शीश नवा कर गुरु गोविन्द आपे गुरचेला कहाया था।  


अकाल की आज्ञा से ग्रन्थ को गुरु का नाम दिया 

“धर्म सदा सर्वोपरि” विश्व में यही पैगाम दिया।  


जहाँ-जहाँ चरण-रज गिरी उनके, वह धरा तीर्थ बन जाएगी,

हे गोविन्द सिंह! तेरी गौरव-गाथा युगों-युगों तक गाई जाएगी।


 कैसे गाएँ हम आरती साहिब -ऐ -कमाल की 

भेंट दिया जिसने सर्वस्व, ऐसी वसुधा के लाल की।

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