कैलाश की अविचल जटाओं की जटिल गाँठें हैं,
स्थिर जहाँ जान्हवी, शशि-किरण को बाँधे हैं।
नेत्रों में मात्र निखिल सृजन झूलता है,
त्रिनेत्र खुलें जब, प्रलय ही उफनता है।
नासिका का श्वास-वेग जीवन की सरिता है,
निरंतर काल जिनका राम-नाम में रमता है।
अतिशयोक्ति, अनुप्रास, उपमा सब तुच्छ छोटी हैं,
उनके समक्ष, जो शून्य से शतकोटि हैं।
नीलकंठ की महिमा का कितना विस्तार दूँ?
क्या-क्या अपनी लेखनी से पन्नो पर उतार दूँ?
कंठ के आभूषण सुशोभित विष और भुजंग हैं,
भस्म की रज से रमे अंग-प्रत्यंग हैं।
मुंडमाल सजे त्रिलोकीनाथ, वही त्रिपुरारी हैं,
हाथ में त्रिशूल सोहे, वृषभ की सवारी है।
डगमग चाल से भूचाल आ जाता है,
तांडव देख जिनके, महाकाल काँप जाता है।
गौरीश जिनकी महिमा अविरल गाते हैं,
देवों के देव, मात्र अंजलि-जल से प्रसन्न हो जाते हैं।
हर युग के राम के बजरंग आप ही रहेंगे,
'शिव सदा सहायते' हम यही कहेंगे।
विनती लघु सी, चरणों में शरण मिल जाएगी,
टल जाएँगी विपदा, भव-बाधा मिट जाएगी।
तुच्छ मेरी याचना, तुच्छ मेरा कहना है,
छाया बन क्षण-क्षण, संग प्रभु रहना है।
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