Tuesday, March 3, 2026

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 शैलसुता कल-कल निनाद कर उतरती,

मृदुल कलरव से मानस हर्षित करती।

(प्रथम: शैलपुत्री)


श्वेत वसना, तप-आचरण पावन जिनका,

ब्रह्मचारिणी हरतीं संताप जन-जन का।

(द्वितीय: ब्रह्मचारिणी)


चंद्र-घंटिका करती गुंजित मधुर छन-छन,

दिव्य आभा से जुड़ता भक्तिमय अंतर्मन।

(तृतीय: चंद्रघंटा)


कुश-अंश से मांडतीं जो इस धरा को,

कुष्मांडा जीवंत करतीं चराचर जगत को।

(चतुर्थ: कुष्मांडा)


वात्सल्य की अमृत-धार जो पिलाती हैं,

स्कंदमाता ही ममता का सार सिखाती हैं।

(पंचम: स्कंदमाता)


कुकर्मों का मर्दन करतीं माँ कात्यायनी,

रक्तबीज-संहारिणी, दुष्ट-दल-दामिनी।

(षष्ठ: कात्यायनी)


काल-कपाल पर जो तांडव रचती हैं,

असुर-विनाशिनी वही कालरात्रि बनती हैं।

(सप्तम: कालरात्रि)


कोटि सूर्यों का तेज सौम्यता में समाया है,

महागौरी ने शुचि पावन रूप पाया है।

(अष्टम: महागौरी)


सुमति तराशकर जो श्रेष्ठ बुद्धि बनाती हैं,

सिद्धिदात्री ही सिद्धियों से अस्मिता सजाती हैं।

(नवम: सिद्धिदात्री)


नवगुण-धारिणी भवानी जग-रखवाली है,

हृदय को मंदिर बना, घर मेरे आने वाली है।

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