बुलाया गया है उस शब्दों के शिल्पकार को,
जो तराशता है रूप, भाव निराकार को।
थाली सजाई उसने दीपों, चंदन, और पुष्पों में भी नमी रही
फिर भी रूठे रहे देवता, ना जाने क्या कमी रही।
वर्णों से लदी थी वैजयंती माला,
ध्वनि के खड़ताल को खरताला।
मौन को पीस-पीस कर विचारों का तिलक बनाया,
कल्पना की बांधनी से ओढ़नी को रंगाया।
अनुप्रास में आभास मिश्रित कर आभूषण विभूषित हुए,
रूपक के श्रृंगार से देवता और सुशोभित हुए।
यमक, श्लेषा, वीप्सा, अतिशयोक्ति व उपमा के पंचामृत से अभिषेक हुआ,
मंद-मंद मुस्कुराए कान्हा, कहीं प्रसन्न महेश हुआ।
ये शब्द वंश के हरकारे,
साहित्य की संतान हैं
इनकी लेखनी के व्याल, विष-अमृत हुंकारे,
भाषा का अभिमान हैं।
इनके चिंतन के कलश में अखिल ज्ञान समाया है
इनकी वाणी से विवश हो ईश्वर स्वयं भू उतर आया है।
मन की गति पर सवार पार रवि के वो जा सकते हैं,
जो अविस्मरणीय है, उसे सरल कर सामने तुम्हारे ला सकते हैं।
अंतर में एक कुटुंब बसाकर अपने में ही रहते हैं,
शायद इसी कारण लोग उन्हें पागल-पागल कहते हैं।
प्रतिबिंब है ये सत्य का, समक्ष इनके सब चमकता है,
विधाता के छैनी-हथौड़े से गढ़े, कोई विरला ही कवि बन सकता है।
जीवित रहकर सृष्टि के कानन में अदृश्य होते जाते है,
विख्यात होते हैं जब निर्जीव खंडहर बन ये जाते हैं।
No comments:
Post a Comment