भक्त-माला सर्वोपरि, सर्वश्रेष्ठ भक्ति-विशेष है,
सवार जिसे भक्तों पर, भक्तन का वेश है।
शीश-थाल शीश पर, शीश बारंबार रावण चढ़ाता रहा,
आँत को काट-काट, धमनियों को बाँध-बाँध वीणा सुनाता रहा।
थमे ना थमे, स्वयं जगदीश हैं,
दस शीश, भुजा बीस, शिव के आशीष हैं।
प्रह्लाद की पुकार पर, नरसिंह का अवतार है,
फोड़कर-फाड़कर हिरण्यकश्यप, करते बालक को दुलार हैं।
मगन मार्कण्डेय, मृत्यु को पराजय कर रहे हैं,
हुँकारते महाकाल, काल से लड़ रहे हैं।
काशी की गलियों में, झूमते कबीर दास हैं,
राम नाम की मस्ती में, डूबे हर श्वास हैं।
रसखान की आँखों में, ब्रज का ही वास है,
कृष्ण-भक्ति में लीन, उनका अनन्य विश्वास है।
विट्ठल-विट्ठल खड़काते, संत तुकाराम हैं,
प्याले भर-भर पिए विष का, मीरा को बस यही आराम है।
अटूट असीम विश्वास, अपरंपार होता है,
भरने मायरा, भगवन स्वयं प्रकट होता है।
कसाई शालिग्राम को झुलाता है,
हाथों को खोकर भी नाचता जाता है।
कर-कर कर्मा बाई, भोर में खिचड़ी पकाती है,
पाने को भोग, जगन्नाथ दौड़े आते हैं।
भक्तों में शिरोमणि, महाराज हनुमान हैं,
जिनके बिना नहीं बनते, राम के कोई काज हैं।
भक्ति और भगवन में, अंतर कहीं फिर कहाँ होता है,
नैन होते हैं भक्त के, भगवन ही रोता है।
भक्त-माला का यह मोती, सदा जग में गाता है,
देख प्रेम भक्तों का, भगवान पिघल जाता है।
भक्ति की ही शक्ति से, जगमग सृष्टि होती है,
भक्ति बिना तो मूरत भी, केवल पत्थर होती है!
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