Monday, April 20, 2026

Pedo ki Panchayat

कह गए कोई व्यक्ति विशेष महान,

सत्य विचलित हो सकता, पर तजता नहीं स्थान।

पराजित भले न हो, पर होता है परेशां,

सुनो आज वृक्षों की व्यथा और उनकी दास्तां।


वातो-वृक्षों ने मिलकर फिर गुहार लगाई,

आज कुंज-वाटिका में एक पंचायत बिठाई।

सरपंच पीपल ने पंचों संग गंभीर विचार किया,

मनुष्य के दुर्व्यवहार का सबने मिलकर सार किया।


हम वसुधा की कोख के हैं असली लाल कहाते,

सलिल का भोजन पाते, अंबर तक हाथ बढ़ाते।

पवन-देव के अश्व हम, सूर्य का तेज पी जाते हैं,

प्राणवायु के दूत हम, जग का ताप मिटाते हैं।


भुजा हमारी सावन के झूले, हरित केश लहराते हैं,

पुष्प-गजरों से लदकर हम उपवन को महकाते हैं।

फलों का सेहरा माथे पर, जो सबका पोषण करता है,

पर मानव का लोभ सदा, इन प्राणों पर ही मरता है।


बैठे लोभी बेताल मनुज, हमें अपाहिज करते जाते हैं,

छील-काटकर देह हमारी, कंकाल बनाते जाते हैं।

चीखती हस्ती, चिंगारते गज, कौवे शोर मचाते हैं,

जब पावक की लपटों में ये, हमें भस्म कर जाते हैं।


शोक बरसता अंबर से, जब वन, वन नहीं रहता है,

बताओ इस अन्याय पे, मनुज का कानून क्या कहता है?

कभी मन्नतों के धागे बांध, हमें देव बताते हैं,

जी भरता है तो लालच में, कुल्हाड़ी चला गिराते हैं।


हमारे अंश से ही पले, न्याय के ये आलय हैं,

कानून की देवी के पन्ने, हमारे काष्ठ का ही आश्रय हैं।

क्या सत्य हार स्वीकार कर, मौन होकर बैठा है?

या न्याय का तराजू भी, अब स्वार्थ में ही पैठा है?


पुष्पों को जब भेदते हो, तब हारों के हार चढ़ते हैं,

हमें कुरेदकर ही तो, माथे के तिलक उभरते हैं।

सिलबट्टे पर पिसकर ही, रंग हिना का निखरता है,

कागज बनकर तन हमारा, अक्षरों को रूप धरता है।


सबसे पावन श्वास तुम्हारी, हमसे ही तो आती है,

पर विडम्बना देखो, हमारी लकड़ी ही तुम्हारी अर्थी सजाती है।

गर अब भी तुम न जागे, तो चिर-निद्रा में सोते रहना,

होगा जब अति-विलम्ब, तब हमसे कोई उलाहना न कहना।


मत कहना कि समय रहते, किसी ने तुम्हें बताया नहीं,

तुम्हारी लापरवाही के पालने को, किसी ने हिलाया नहीं।

उचित यही है, आज अभी से संरक्षण में जुड़ जाओ,

हम ही 'आधार' हैं तुम्हारे, हमें बचाकर स्वयं को बचाओ।

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