कभी खामोशी भी इक गूँजती चीख बन जाती है,
जब दिल के भीतर दबे कोई तूफान होते हैं।
दुनिया समझती है कि सब सामान्य है बाहर,
मगर अंतस में कहीं सब लहू रोते हैं।
जिनके स्वप्न असमय ही सुप्त हो जाते हैं,
वहाँ अकाल की वीरानियाँ छा जाती हैं।
कतरन-कतरन आदमी खुद ही गलता जाता है,
जब स्मृतियाँ भीतर ही भीतर खा जाती हैं।
ऐसे खंडहर फिर 'अश्वथामा' सा शाप बन जाते हैं,
जलते हुए रुख, राख का ही भोजन पाते हैं।
पर फिर... तपोवन से प्रसन्न हो ऋतुराज आते हैं,
ऐरावत पर सवार, नई उमंगें जगाते हैं।
विरह के राग को त्याग, मल्हार के गीत सजते हैं,
सूखी-खोखली आँखों में फिर सलिल (जल) भरते हैं।
तम में तपते आसमान पर घनघोर घटा छाती है,
तपन बुझाने को कुदरत स्वयं उतर आती है।
किन्तु... विलम्ब से आए देवों का उत्साह अब दम तोड़ चुका,
आस की डोर थामे जो बैठा था, वो आस छोड़ चुका।
सब रंग बेरंग हुए, बस यादें ही हाथ आती हैं,
हम हाथ पर हाथ धरे, क्यों व्यर्थ पछताते हैं?
तुम चीख कर तोड़ दो मौन की ये फौलादी दीवारें,
पड़ने दो इन रूढ़िवादी बंधनों पर गहरी दरारें।
तुम स्वयंभू, तुम जगन्नाथ, कल्याण करो इस विश्व का,
त्याग दो अमरत्व का मोह, घूँट भरो अब विष का!
No comments:
Post a Comment