आलस्य पूर्ण अंगड़ाई लेकर के,
अच्छी-खासी जमाई लेकर के।
पालने में सुप्त हम हो जाते हैं,
चलो अब हम सो जाते हैं!
निद्रा के घाट उतरते हैं,
स्वप्न सत्य में उभरते हैं।
बस दिखते खेत -खलियान
तानाशाह का न कोई निशान
परिश्रम के बल से ही परिणाम है,
इस प्रदेश को मेरा नित्य प्रणाम है!
कहीं कर्चश से आकर्षित हो मैं जाता हूँ,
प्रेतों की टोली द्वारा उछाला उस पार को जाता हूँ।
विस्तार विराटकाय सम्मुख मेरे यथार्थ खड़ा है,
लोभ-मोह-स्वार्थ से क्षण-क्षण होता वह बड़ा है।
मैं फाँदकर इस दीवार को पार जाना चाहता हूँ,
पर भुजंगों-वृषकों के कुटिल व्यूह को लाँघ न पाता हूँ।
वाणियों में वाणी मिली, पीटते हुए करों में,
वेदना मेरी सुनाई देती है प्रसादों और घरों में।
लाठियों तले पिसती मेरी अस्थियों से वज्र बनेगा,
रक्त मेरा आने वाला नया कल रचेगा!
अब मैं पार उस घाट न जाऊँगा,
ठान ली है, घसीटकर घाट को यहीं लाऊँगा!
इस हवन में आहुति हैं जिनके प्राणों की, वे धर्मलोक को पाएँगे,
और जो अब भी न डोले, ये सिंहासन समेत तोड़े जाएँगे!
खम्भा फाड़कर जब न्यायाधीश अपनी पर आएँगे,
भगवा-भगवा रटने वाले, भला कहाँ तक बच पाएँगे?
कर्मों का भय करो तुम, मूकदर्शक न बने रहो,
सूखे, अकड़े हुए रुख तुम प्रगति की राह में न तने रहो!
देह जलेगी तुम्हारी बाहु काट दी जाएँगी
कुकर्मो की सजा तुम्हारी पुष्टि भोगती जाएँगी।
अपाहिज होकर फिर तुम बैसाखी की उपेक्षा न रखना,
जन-जन में निकलने से पूर्व अपने मुख को ढकना!
तुम न्याय के पालक हो, कुछ तो देवी का आभार करो,
जो दानव खा रहे प्रजा को, तुम बन पौरुष उनका संघार करो!
न राख बचेगी इस छल की, न साए बाक़ी रह जाएंगे,
हम जलते सूरज बनकर अब खुद आसमान पे छाएंगे।
जब तक यह धरती धड़क रही, हर जुल्म का हिसाब होगा,
देख लेना, इस अंधेरे के पार ही इंकलाब होगा!
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