Tuesday, June 6, 2017

Yeh Ishq Hai

इश्क़ वो कड़ी है जो इंसान को रब्ब से मिलाया करती है
ये तो बंजर ज़मीन पर भी गुल खिलाया करती है
सुध -बुध खोकर खुद को खुद से मिलाया करती है
इश्क़ वो कड़ी है जो इंसान को रब्ब से मिलाया करती है

अवल्लेया इश्क़ रब्ब बनकर ज़मीन पर उतरता है
सोहणे यार के दीदार सदा सामने रहा करता है
ये वो ईबादत है जो सब कुछ खोकर हासिल हुआ करती है
इश्क़ वो कड़ी है जो इंसान को रब्ब से मिलाया करती है

 की इश्क़ वो नहीं जो दिवाना कर दे
सर चढ़ कर के आवारा कर दे
इश्क़ तो वो है जो हद्द कर दे
दुनियादारी की दीवारे गिरा दे
अपनी मौजूदगी साबित कर दे
इश्क़ तो वो है जो हर ख़ामोशी बयां किया करती है
नज़रों की अपनी भाषा बनाया करती है
इश्क़ वो कड़ी है जो इंसान को रब्ब से मिलाया करती है

इस लाइलाज रोग की दवा भी कहाँ मिला करती है
पर लग जाये जो ये  रोग तो दुआ बना करती है
दर्द-इ-उल्फत बयां किया करती है
इश्क़ वो कड़ी है जो रब्ब से मिलाया करती है


Saturday, June 3, 2017

Never Growing Up

why do they tell me to grow up?
i want to stay the way i am
don't want to change my ways
suiting the supposedly
my emotions are on a dynamic
don't feel like becoming mature
i laugh out loud
crack jokes at the peak of silliness
i throw tantrums
break things venting out my anger
i fear the uncertainty
and cry like a baby

when sometimes
when i fail
when i couldn't achieve
explode it all out
what's the use of growing up?
never shedding a single tear
finding a corner and drinking
your fucking laments away
rotting to therapy, wasting away to a shrink

i am ruling out all possibles of growing up
don't want to become mechanical
i am just the way i want to be
the world might rant about my ways
i might turn into a mockery
but that's the way i am
the way i was
the way i forever will be
and if your too mature
too grown up to handle this deal
the door's open, feel free to leave





Friday, May 12, 2017

Vichalit Mann

सोच रहा हूँ की किस तरह अपने विचलित मन को आवारा होने से रुको, यह मन भी किसी अल्हड ज़िद्दी बच्चे जैसा है जो मेरी सलाह पर गौर करना तो दूर उसे बड़ी हे बत्तमीज़ी से अनसुना कर देता है, मै लाख समझाता हूँ उसे पर उसने आजतक मेरी सुनी कहाँ है, जो जी में आता है कर देता है , जैसी भी हो बात मुंहफट की तरह बक देता है।  काश की कोई टोना-टोटका होता जिससे मैं अपने मैं को वश में कर सकता, मुठी में बंद कर रख सकता जिस तरह शिव की जट्टाओं में चंचल गंगा।  मेरी इस परेशानी को देखर मेरा मन मेरा मज़ाक बनता है, मैं उपहास का पात्र बन गया हूँ उसके लिए।  इम्तेहान नज़दीक हैं और वक़्त है की कछुए की चाल चल रहा है अब अगर ऐसे में कलम उठाने  भी तो मेरे ख्यालों के धागे अपने आप हे सुलझ जायेंगे, खुलकर बेहया से बेशरम से बेलगाम घोड़े की तरह दौड़ते फिरने लगेंगे और मैं असमर्थ सा अपने लाचारी का तमाशा देखता रहूंगा, वो तपते जलते हुए शोले के समान आकाश से बरसेंगे, अगर यह सब्र का बांध टूट गया तो मेरे ख्याल विनशकाये सैलाब बनकर उमड़ेगा और मुझे भी उस बहाव में बहाकर ले जायेगा।


Thursday, May 4, 2017

Dariya-ae-Ulfat

दरिया ऐ उल्फत के किनारे खड़े होकर
कितने हे थे जो बर्बाद हो गए
कुछ हिम्मतवाले थे
इश्क़ के लिए वो आबाद हो गए
वो एक हे बार में पार हो गए

शोले की आग में जल कर तप चुके थे
लड़ते लड़ते दुनिया से हज़ारों मौते मर चुके थे
राम नाम क्या लेते वो
उनके सांसें जप्ती माला मेहबूब की
सजदे किये हैं जिसके लिए
जिन में  परवर दीगर छुपा
जिसके लिए यह हाथ हर दम हे दुआ करते हैं

दरिया-ऐ -उल्फत सब्र के सरे बांध तोड़ दे
इंतेज़ार की हद्द मिटा दे
गम के रुख मोड़ दे
लड़ कर, कट कर डर कर, मर कर
पहुंचा फिर भी उसके दर पर
इश्क़ ऐसा की कायनात भी सलाम करे
जिगरवाले थे तो प्यार के लिए बदनाम हुए
बेसहारा थे मगर फिर भी बेडा पार हुए



Saturday, April 29, 2017

Permanent One

so i had a conversation with him
presenting myself like some shameless being
as i keep on removing layers of secrets,
piece by piece
un-strangling myself, revealing it
how come he is so baring?
patient, so patient
where does the patience come from?
after all the things i did?
the situation i've been in
anyone could abandon
but he had the courage to stay
he doesn't want to leave
and i ask him?
i ask myself?
why? why in the name of God he doesn't want to leave?
he pays attention to my bullshit
doesn't listen, pays attention carefully
and trust me a million times i have tried to run away
tested myself, resisting him
i want to distract myself from him
but he doesn't want to, fucking becoming my habit
yet i asked him "will you ever leave me?"
"no way i don't see that happening ever, i won't ever leave"
" you really thing you can bare with my tantrums, my roller coaster emotions, put up with me"

"no, i believe i would love to be part of this crazy ride, i won't ever leave"
 my permanent one in this temporary world
guess you are my forever, guess your struck with me



Tuesday, April 18, 2017

Pagli si Ladki

उसकी हाय में मेरी हाय निकलती है
आह में जब वो आहें भरती है
खुद तो पागल है
मुझे भी पागल करती है

कभी यूँही हस्ती है
बिन बात के रूठा करती है
पर मान जाती है तभी बात बनती है
पगली सी वो है और मुझको भी पागल करती है

बिखरती है कलियाँ
खुश होते हैं दोनों जहाँ
मुड़ती है हर नज़र
उसके दीदार को
जब भी वो गली से निकलती है
क्या समझाओ उसे की उसकी एक झलक को तरसते मेरे नैन
पता नहीं उसके ख्यालों में कहाँ जाते मेरे दिन-रेन
बेखबर सी वो नहीं समझती है
पगली सी वो मुझको भी पागल करती है

परेशानी में जब यूँही हस्ती है
उसी दुःखी देखकर मेरी जान भी पिघलती है
बहकता हूँ मैं
महकती है वह राह
जिस राह से वह गुज़रती है
पगली सी वो है मुझको भी पागल करती है

एक मुस्कान पर नूर की बारिश बरसती है
उसके बिना ज़िन्दगी वक़्त की तरह कटा करती है
पर जब हो पास मेरे तभी ज़िन्दगी, ज़िन्दगी लगती है
वो चाहे मुझे दुत्कार भी दे
यह मेरी पहचान कुछ नालायक सी लगती है
पगली सी वो मुझे भी पागल करती है

रोता हूँ मैं भी जब वो चुपके से सिसकती है
कुछ कहने की हिम्मत करूँ कैसे ]
बात जब हलक में अटकती है
ढ़कने ऐसी रफ़्तार पकड़ती हैं
मेरी जान जब मेरे गले लगती है
आती है जान में मेरी जान
पगली सी वो मुझे भी पागल करती है

Sunday, April 2, 2017

Sapno ke Sweater

सपनो की ऊन से आशाओं के स्वेटर बुनते -बुनते
कुछ करने की माला में चाहतों के मोती पिरोते -पिरोते
पुराने जंग लगे शीशे से बदलाव की बातें करते -करते
आसमान से ऊँची अभिलाषा को धुआं देखते-देखते
सोच की उधेड़भुन करते -करते
ये जान लिया की जवानी की किस्मत बूढ़ी उँगलियों सी कमज़ोर हो चुकी है
झुर्रियां पर चुकी है उस जोश में
जो रगों में बहता था कभी
वो बसंत राग नहीं रहा अभी

हज़ार बार टूट- टूट कर बिखरते- बिखरते
खुद को संभालते हुए समझते -समझते
ये जान लिया
पहचान लिया
की खेल -खेल में की गयी गलतियां जीवन का सबक बन जाती
पुष्प का क़त्ल क्यों जब पतछड़ में डालियाँ बिखर जाती
और अश्रु तो बहोत बहाये पर आंख से निकले आंसू वापिस नहीं आते
सप्तश हो गया की
वक़्त हे जीवन का अध्यापक है
उस माथे का
इन हथेलियों का
भाग्य विधाता है !