Monday, September 30, 2024
Keep an eye on me
Tuesday, September 24, 2024
Humein Bulao
शुन्य शैया पर सोया सड़ता अँधेरा
कतरा- कतरा निघलता गहरा -गहरा।
लाली लालिमा लहु की फूटी
जब डोर जीवन की टूटी।
सम्पूर्ण सृष्टि ने संग में हुंकारा
त्राहि -त्राहि कर माँ शक्ति को पुकारा।
अश्रु अविरल ैवेघ में उफान मार रहे थे
और विरोध में खड़ा था पुरुष उसकी बनाई लकीरे जो लांग रहे थे।
रक्त लीला में रमी वो खुद को रंग रही थी
आवाहन शक्ति कुछ इस ढंग से कर रही थी।
आँखों में एक अजीब सी आशा लिए वो दम भर रही थी
विलुप्त होना चाहती है , वैसे भी जीते जी भी मर ही रही थी।
बाहों को बड़ा -बड़ा कर वो बनाती पौड़ियाँ
जो थी पाँव की जुत्तियाँ दो कौड़ियाँ।
चील सी चीख चीरती हुई सन्नाटे को "माँ !!! तुझे छोड़ सिंहासन आना ही होगा "
कौन है अधिकारी वसुधा आज तुझे बताना ही होगा।
हम तो लहराती फैसले हैं , हमे दबोचा,उखाड़ा , काटा , कुचला जा रहा है
ये नर स्वयं को त्रिलोकीनाथ बता रहा है।
इत्रा रहे ये त्रिदेव के अंश सत्ता जो इनके पास है
अब इन्हे कौन बताये? कौन जगाये ? इनके इष्ट हे देवी के दास है।
चरम सीमा पर है दरिंदगी , खुल आम फिरती है हैवानो की टोलियाँ
सजी पड़ी है अर्थियां फूलों की और खाक हो चुकी है डोलियाँ।
तुम आकर पाट दो पापियों के रक्त से भो को
तुम ही तो सर्वगुण समपण स्वरुप हो।
इस दूषित दुनिया में अब और ना रह पाएंगे
शपथ है तुम्हारी अब और विलम्ब ना सह पाएंगे।
उन्मुक्त करो हमें माँ शीग्र अति शीग्र तुम चली आओ
गर आने में हो दिक्कत तो हमे समीप बुलाओ।
Thursday, September 19, 2024
Sabr Karo Mere Yaar
कस ली है ना तुमने फंदे की गांठे
इससे पहले तुम चल बसों सुनते जाओ मेरी बाते।
मैंने पूरे इतिहास को खंगाला
और फिर ये निष्कर्ष निकाला।
इससे भोगना पड़ता है अनंत तक संताप
आत्मघात है सबसे श्रेष्ठ पाप।
और तू क्या समझता है सीधा भगवान् के पास पहुँचजायेगा
मन मर्ज़ी ईश्वर से शिकायत लगाएगा।
तू तो बस यूँही लटका रहेगा
ना मिलेगा मोक्ष माया में भटकता रहेगा।
हां मैं तेरी सभी समस्याएं जानती हूँ
और तेरी व्यथाओं को पहचानती हूँ।
कर प्राणो का हरण जब रावण ने प्रहार किया
क्यों ना मोड़ धनुष को राम ने खुद पर हे वार किया?
क्यों ना बिछाई कृष्णा ने स्वयं की शर शैय्या
जब छूट गयी नगरी , मुरली, वंश,राधा और मैया।
जब गुरु नानक के पीछे लोग पत्थर लिए भागे
क्यों नहीं उन्होंने प्राण वहीं त्यागे।
जब गोविन्द ने वार दिए थे अपने लाल
क्यों नहीं उठायी किरपान खुद पर क्या उन्हें नहीं हुआ मलाल ?
अपनों ने ही अपनों पर घात किया
अब बताओ इनमें से कितनो ने आत्मघात किया ?
तुम्हारी धम्मीयो में बहता रक्त इनकी ही तो निशानी
अब बताओ किस बात की परेशानी है ?
ये ज़रा सी हवाओं से तुम यूँ डोल रहे हो
"मरना चाहता हूँ मैं " तुम ये बोल रहे हो।
दीपक हो तुम जो अँधियो में जला करते है
क्या पर्वत भी लेहरो से डरा करते है ?
दिशाओ दोगे तुम , तुम्हे मार्गदर्शक बनना होगा
प्रतिनिधि बन सभी का तुम्हे रण में उतरना होगा।
इस रणभूमि में जो विचलित मन पर विजय पायेगा
पताका चमकेगा उसी का वो चक्रवती कहलायेगा।
आशीषो का सावन होगा
तुम देखना दृश्य बहुत पावन होगा।
ह्रदय को मजबूत बनाओ
संकटो के समक्ष दिवार बन तन जाओ।
अब भी समय मत मानो यूँ हार
ज़िन्दगी बहुत बड़ी ज़रा सब्र करो मेरे यार।
Saturday, September 7, 2024
Meghon Ka Naath
राक्षस कुल का प्रज्वलित अंगार
चर्चा जिसके चरित्र पर हुई नहीं विस्तार।
कालिख पोत -पोत कर उसे नहलाया गाया
अवगुणो की मुहृत उसे दर्शाया गाया।
बुराई का नाम देकर जिनके पुतले वर्ष दर वर्ष हम फूंक आते है
राख समेट -समेट कर क्या सच में उन्हें जान पाते है।
षटकोटि नमन दामिनी पर सवार मेघो के नाथ को
षटकोटि नमन जो टालते नहीं थे पिता की बात को।
तम के झूलों में झूले वो वारिस अंधकार के
थर -थर कांपे धरा उनके एक हूंकार से।
माया के प्रजापति वो दैत्यता में अधीन
पिता के अभेद्य कवच पितृ मोह में विलीन।
विश्व ने उन्हें धुतकारा
जब उनके वार ने लक्ष्मण को मूर्छित कर डाला।
रण की रज में रौंद योद्धा घर को आया
सीने से लगाकर माँ ने खूब लाड -लड़ाया।
"अब भी कुछ नहीं बिगड़ा " संधि का प्रस्ताव वो बढ़ाता रहा
"आम मानुष नहीं है हरी के अवतार " इंद्रजीत पिता को समझाता रहा।
अफ़सोस की सम्राट अँधा,गूंगा और बहरा हो चूका था
विवेक अपना खो चूका था।
चरणों में गिर माँ ने की मिन्नतें , "भगवान के विरुद्ध शास्त्र तू क्यों उठाता है ?"
"क्यों मेरे प्राणो की बाज़ी यूँ तू लगाता है ?"
ढांढस देकर मेघनाथ बोले , "शूरवीर रण से ना मुँह छुपाते है "
मारते है या स्वयं मर कर आते है। "
ये मेरा कर्म -धर्म इसे मैं निभाऊंगा
पिता की अवज्ञा कर स्वर्ग में भी पाताल पाऊँगा।
अब की पारी में लखन खड़े थे मृत्यु को लांग कर
धनुष पर तना तीर को तान कर।
बाणो की वर्षा में वीर मयूर बन जाते है.
तांडव कर मृत्यु का कृपाल बजाते है।
फिर ऐसा भूचाल हुआ
प्रलय का हाहाकार हुआ।
मौन हो गयी वसुधा
मेघनाथ बेहाल सा गिरा।
नींद में वो मंद -मंद मुस्काते थे
राम, लखन और वानर सेना सभी शीश निवाते थे।
जिन्होंने इंद्र को जीता
आखिर उनका अंतिम क्षण कैसे बीता।
कहा यम ने की भले ही तुमने पकड़ा अधर्म का हाथ
पर अंतिम दम तक पिता को माना अपना नाथ।
जय -पराजय तो बात है बाद की
याद रखेंगी तुम्हे पीडियां तुमने पुत्र की परिभाषा सजा दी।
Saturday, August 24, 2024
Vardaan Ho
हे पौरुष अब से हर शक्ति को ये वरदान दो
अब से हर देवी सीला ,शील ,पत्थर पाषाण हो।
तुम्हे ारियो -कुल्हारियो से फोड़ा जाये
और जो बची -कूची हिम्मत है उसे हथोडियों से तोडा जाए।
तुम्हारे अंश पत्तर-कंकड़ को भी न आराम मिले
मसल-मसल कर मिट्टी में हे विराम मिले।
पुरुष को उत्तम बनाने में तुम्हे हे तराशा जाए
टक -टकी लगाकर देखो तुम सितम तुमपर बेतहाशा जाए।
कुछ इस प्रकार से हो श्रृंगार तुम्हारा
मौन और बहती अविरल अश्रुधारा।
तुमपर ऋतुओं का ना कोई असर न हो
विचलित रहो तुम सदा ही कभी निडर न हो।
कालिख भरी काल कोठरी में तम्हारी जंग लगी आंखे
सड़ती लाश सपनो और बाहे तुम्हारी सुखी शाखे।
हे पौरुष अब से हर शक्ति को यही वरदान हो
क्यूंकि मैं नहीं चाहती की नारी बस कहने के लिए महान हो।
ऊब चुकी हूँ मोमबत्तियों से जलती चिताये देख कर
हार चुकी हूँ निहथि देवी की व्यथाएं देखकर।
हमे ने हे छीने हैं शक्ति से उसकी खडग, ढाल और भाला
वार कर स्त्री पर हमने सृष्टि को उजाड़ डाला।
अब जो असुर विकृति पर चल रहा ये विश्व तो यूँ जीना हे होगा
इस विष मंथन से निकला हलाहल हमे पीना हे होगा।
कुकर्म, कुधर्म में पल रहा है आज का मानव
धित्कार है ये मानव ये है परम दानव।
ये जो अपने पौरुष में विलीन है
भूल चूका है की स्वयं शिव शक्ति के आधीन है।
जब सौम्य गौरी दुर्गा, चामुंडा काली खप्पर वाली बन जाएगी
मूली सामान मुंडो को काटती जाएगी।
प्यास भुझेगी उसकी पापियों के रक्त पान से
तू क्यों न्योता दे रहा है विनाश को बात सुन मेरी ध्यान से।
अब से नारी का सम्मान तेरा पहला धर्म होगा
उसके सपनो को देना उड़ान तेरा पहला कर्म होगा।
अगर स्त्री है रूप है देवी का तो तुझे परिचय राम का देना होगा
संचार कर सृष्टि का तुझे मर्यादा में रहना होगा।
तू चले जो इस पथ पर तो रास्ते देंगे पर्वत और अस्समान झुक जायेंगे
गर होगा विफल तू सारथि स्वयं भगवन बन जायेंगे।
हे पौरुष अब से किसी नारी को ना ये वरदान हो
अब से ना कोई देवी शील,पत्थर ,पाषाण हो।
Tuesday, August 20, 2024
Rona Ravan Ka
सुना है वो आया है
जो देवी को हर कर लाया है
साम -दाम -ढंड -भेद करके भी
उसकी परछाई को भी न छू पाया है।
ये बाते जब रावण का कानो में पड़ी
मच गयी फिर खलबली
पिघले पर्वत आँखों से और बहने लगी अश्रुधारा
त्राहि -त्राहि कर उसने तीनो लोको को पुकारा।
हाँ -हाँ मैं सब मानता हूँ
अपने पाप को बाखुभी पहचानता हूँ
लोभ मेरा सार्थी था अंधेरो पर मैंने राज किया
अपने पंजो से नोच -नोच कर अपने भाई का राज पाठ हङप लिया।
वासना की बातो में आकर मैंने खुद को यूँ बदनाम किया
स्त्रीयो का मैंने अपमान किया।
गुनाहो का देवता हूँ मैं , झूठ की मैं मुहृत हूँ
गिद्ध चिथड़े कर गए है जिनकी लाश से भी बत्सुरत हूँ।
लेकिन उनका क्या जो राम की मौखटे लगाते है
राम -नाम की आड़ लेकर ना जाने कितने अपराध छुपाते हैं
आजकल रावण ही रावण को जलाते है।
याद रहे मैं वहीं हूँ जिसने शीश काट-काट कर शिव को मनाया था
चहुवेद का ज्ञान जिसकी रग -रग में समाया है।
अंतिम श्वास में लक्ष्मण का पाठ पढ़ाया
और जिसे तारने स्वयं हरी ने अवतार लिया आया था।
आज अपने अंतर्मन में झांको
तोल -मोल कर देखो कितने राम और रावण हो ज़रा खुद को नापो।
Monday, August 5, 2024
Hind Di Chadar
सिखों का है बस एक ही असूल
की पहला मरण कबूल
जिन्होंने शहादत को परिभाषा दी
कथा है ये हिन्द दी चादर की
अपने लिए मरे सो पर वो हो जाते है अमर जो दूजो के लिए लड़े
नमाज़ो और जनेहु से दूर वो थे बस इंसानियत के साथ खड़े
सताये हुए जो उनके दर पर पहुंचे
जिनके अस्तित्वे थे सिरफिरे गिद्ध ने नोंचे
व्यथा सुनाते अपनी वो रोते - रोते "हे तेग़ बहादुर राइ ,
हमे बचाओ की अब हमारी लाज पर है बनआयी "
सोच में सभी थे डोले
चुपी तोड़कर बाल गोविन्द बोले
"आप सम्भारो इन्हे , आप ही हो पालनहार
आप ही हो नानक जन की लाज रखो करतार "
ढांढस नहीं उन्होंने हिम्मत थी बड़ाई
और बेटे की बाते सुनकर पिता की ऑंखें थी भर आयी।
यहाँ सिंघो का एक जथा तयार हुआ
और वह दिल्ली में एक पागल कुत्ता खूंखार हुआ
अपने प्यारे सिंघो संघ श्री तेग बहादुर जी को बंधी बनाया गया
और औरंगज़ेब के सामने लाया गया।
वो चेहरों पर चेहरे लगाता रहा
खुद को खुदा का बंदा बताता रहा
भेड़िया नज़र आ रहा था भेड़ की खाल में
छुपा जा रहा था वो झूठ की ढाल में
वो अँधेरा था उसपर रौशनी का कोई असर न था
जिन्दा पीर था वो उसे कोई डर न था
सोचा उसने की लालच तो है बुरी बला लेकिन इस बला से कौन बचा है
पर मूरख था स्वयं परमात्मा वो देने लालच चला
जब नाकाम हो गए आज़माये हथकंडे
ढोल पीटा उसने बजाये डर के डंडे
हुक्म जारी किया गया
इस्लाम या मौत आखरी अवसर दिया गया
सभी ने सहमति से ठुकराया
उबला खून औरगंजेब और भौखलाया
बीचो बिच चीर दिया ारियो से भाई मति दास को
और रोई में लपेट कर जला दिया भाई सती दास को
बेशिकन बस वाहे गुरु का नाम उचारा
और उबाल -उबाल कर भाई दयाला को मारा
अब बारी थी उस संत फ़क़ीर की
जिनसे खींची दी थी मानवता की
अड़िग थे वो अपने निश्चय के पूरे पक्के थे
देखकर कर ये सभी हक्के -बक्के थे
एक चौपट राजा ने सभी का जीना मोहाल किया
हिन्द की खातिर श्री तेग़ बहादुर जी ने शीश कटवा दिया
दिल्ली की खून हवाओं में सन्नाटा उथल -पुथल रहा था
कोई मदमस्त हाथ अंधेर नगर को कुचल रहा था
इतिहास को हम हर बार हे दोहराएंगे
तानशाहों के आगे न कभी शीश निवायेंगे
तुम भी कमज़ोर की दिवार बन जाओ
और गज क्र फ़तेह बुलाओ!!!
वाहे गुरु जी का खालसा
वाहे गुरु जी की फ़तेह