आज़ादी की खातिर
हुक्म टालना पड़ता है
कल मनमरज़ी करने के लिए
आज मन को मारना पड़ता है
बाज़ी इश्क की जीत
के हर बार हारना पड़ता है
खुद का खुद में कुछ ना रहे कुछ
खुद को उसपर वारना पड़ता है
आज़ादी की खातिर
हुक्म टालना पड़ता है
कल मनमरज़ी करने के लिए
आज मन को मारना पड़ता है
बाज़ी इश्क की जीत
के हर बार हारना पड़ता है
खुद का खुद में कुछ ना रहे कुछ
खुद को उसपर वारना पड़ता है
पत्थर है वो
आदत है मेरी बहने की
दिल ही काफी है
ओकात नहीं महलों में रहने की
निकाह कर बैठा हुं तेरी रूह से
हिम्मत नहीं है कहने की
बेहद हो गए हैं सितम उसके
मेरी भी ज़िद्द है सह
दुर रहो इश्क से ये एक बुरी बला है
टालते-टालते रह गया पर ये सवाल कहाँ चला है
सुख गए लफ्ज़ मेरे
खुश्क गला है
चाँदनी में धुली है वो
सूरज से उबटन मला है
मुद्दत से कैद है
ये वक़्त का आँसु कहाँ ढला है
अब भी है वक़्त की रूक कर सजदे कर लो
तेरे कुचे से वफ़ा का जनाज़ा चला है
बेकदरो पर क्यो है इलज़ाम
जनाब दिल तोड़ना भी एक कला है
सफ़र बेसब्री का कटेगा नहीं
अब दर्द मुझसे बांटेगा नहीं
मुद्दत हो गई राह तकते
नज़रों का खालीपन छंटेगा नहीं
सहरा पर है नाम लिखा
मुकर्रर है वो मिटेगा नहीं
अड़ियल है जो दिल से
यु हटेगा नहीं
ये भी सच है कि खिलाफ़ हमारे
वो डटेगा नहीं
इज़्ज़तो का पैमाना है
अब घटेगा नही
बचा लो दामन इस रोग
से कोई बचेगा नहीं
तोहमते कसेगे ज़माने वाले
तु साथ मेरे जचेगा नहीं
जो खुद में मिसाल है, उसकी कया मिसाल दु
मकान मालिक है वो मेरे दिल का,किराएदार समझ कैसे निकाल दु
हैसियत है उसकी, कोई एरा-गैर नहीं जो धितकार दु
तिल-तिल कर तड़प है अब कया हिसाब दु
बनती-बनती बात बनी है, बात कैसे बिगाड़ दु
साया उसका करता है राखी, खुद को कैसे संभाल लु
राम मिलाई जोबड़ी है ये, वो विस्फोटक है ओर मै बवाल हु
बात थी वो किसी इतवार कि
दिखी थी जब मुझे पहली बार थी
पहली पौड़ी थी वो प्यार की
वो गली थी मेरे यार की
किसी रोज़ जब नज़रे टकराई थी
शर्म से लाल था मैं, मेरी शामत आई थी
ढिबबे में जो हलवा लाई थी
बात थी ये पहले इजहार की
वो गली थी मेरे यार की
चंद कदमो से शुरू हुई थी
ये कहानी जो हमने पिरोइ थी
याद है कब हसी थी वो कब रोईं थीं
आज भी तरसी है वो कमीज़ तेरे दि दार की
वो गली थी मेरे यार की
हक समझकर जब अंजान ने रखा था हाथ
तिलमिला उठा मैं दिखा दी थी उसे औकात
गजब सी हिम्मत थी मुझ में जब वो होती थी मेरे साथ
गले लगाकर करती शुक्रिया थी
वो गली थी मेरे यार की
उठने लगी उँगलीया ,बरसने लगे सवाल
क्या बताऊँ कैसा मचा था बवाल
अःच नहीं आने दी उसने बनकर मेरी ढाल
अपने प्रेम पर कायम वो बरकरार थी
वो गली थी मेरे यार की