मेरी नीतियों की नींव पर, यह सारा विश्व बना है,
मैंने ही राजधर्म का, पावन ताना-बाना बुना है।
तर्क के पैने बाणों ने, कुरीतियों के सीने चीरे हैं,
मेरे पोषित शिष्य सदा ही, बनकर लौटे वीर हैं।
शास्त्रों में 'अर्थ' को समझाकर, लाभ-हानि का भेद बताया,
नियम रचे ऐसे कि कोई, मनमानी न कर पाया।
किन्तु आज के वर्तमान में, मैं अत्यंत उदास हूँ,
तर्कहीन, निरुद्देश्य खड़ा, मैं केवल रिक्त आभास हूँ।
यह भयावह दृश्य देख, मन मेरा सदा डराता है,
समाज की संकीर्णता से, साक्षात्कार करवाता है।
'कानन-न्याय' से चलती सत्ता, आज यहाँ जंगल राज है,
शक्ति के नखों से नोच रहा, निर्बल को लोभी बाज़ है।
किस 'हरि' का अब कहाँ यहाँ, कोई बस चलता है?
अंधेरे को निगलने वाला बालक, आज रोशनी को तरसता है।
विद्या पर प्रश्न उठते ही, पग मेरे डगमगाते हैं,
अज्ञानी भी गर्व से खुद को, मेरा वंशज बताते हैं।
सुनो शिक्षकों! मंथन करके, क्या तुम उत्तर दे पाओगे?
छैनी और हथौड़े से, क्या नया नायक गढ़ पाओगे?
अज्ञानता के पर्वतों को काटकर, ज्ञान का रण बनाना है,
स्वयं उतरकर कीचड़ में, तुम्हें 'राजीव' खिलाना है।
वरना इन बाल-मस्तिष्कों को, स्वार्थ की दीमक लग जाएगी,
शून्यता का भोजन पाकर, यह पीढ़ी पंगु हो जाएगी।
दर्पण में क्या तुम अपनी, असली सीरत पहचानोगे?
मिथ्या मान-प्रतिष्ठा के, पर्दे कब तुम त्यागोगे?
अब भी बने रहे 'धृतराष्ट्र', तो घनघोर पाप करोगे,
जब लेखा होगा कर्मों का, तब कहाँ पश्चाताप करोगे?
'विद्यासागर' होने का, व्यर्थ न तुम अहंकार करो,
बनकर मेरे सच्चे वंशज, युवाओं में वैचारिक हुंकार भरो।
तुम सखा बनो, तुम पिता बनो, तुम मार्गदर्शक मीत बनो,
शंकाओं का जो दहन करे, तुम वो प्रज्वलित अग्नि-गीत बनो।
तुम्हारे कौशल से सिंचित, हर नर और नारी हो,
आत्मविश्वास से पूर्ण रहें, न लेशमात्र लाचारी हो।
तुम 'वशिष्ठ' बन मानव को, 'पुरुषोत्तम' बना सकते हो,
'परशुराम' बन शून्य को भी, 'शतकोटि' कर सकते हो।
अब यह चाणक्य विदा लेकर, तुमसे एक प्रण लेता है,
जाने से पूर्व अंतिम वचन, तुम शिक्षकों से कहता है—
यदि अपनी प्रतिभा और सामर्थ्य को, तुम व्यर्थ जाने दोगे,
तो भीषण अपराध करोगे, अनर्थ को अर्थ बनने दोगे!
कलम को अपनी शस्त्र बनाओ, नया इतिहास रचा देना,
उठो कि राष्ट्र के माथे पर, तुम ज्ञान का तिलक लगा देना।