Tuesday, January 9, 2018

Tum Bolo

खोलकर दिल के दरवाज़े ज़रा राज़ तुम बोलो
ज़िद्द करे जो ये पलकों की खिड़कियां जबरन इन्हे खोलो
सह चुके हो कितना अब तो इस छुपी से ताले हो तोड़ो
उलझनों में मत उलझो,नाकामियों से न मुँह मोड़ो
शब्दों को तुम बाण बनाकर वाणी के धनुष पर छोडो
कुछ ठीक है ,कुछ ठीक नहीं है,गलत है या सही,इतना खुद को मत तोलो
कम ांकिते है वो तुमको,उनके व्यर्थ वचनो को मत भूलो
अब हो चुकी है बहुत देर,तुम शोर मचाओ,
चीखो चिल्लाओ,मत गभराओ
गुंगु की आवाज़ बनो ऊँचे स्वर में
इस अंधेर नगर में
हल्ला  बोलो



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