खोलकर दिल के दरवाज़े ज़रा राज़ तुम बोलो
ज़िद्द करे जो ये पलकों की खिड़कियां जबरन इन्हे खोलो
सह चुके हो कितना अब तो इस छुपी से ताले हो तोड़ो
उलझनों में मत उलझो,नाकामियों से न मुँह मोड़ो
शब्दों को तुम बाण बनाकर वाणी के धनुष पर छोडो
कुछ ठीक है ,कुछ ठीक नहीं है,गलत है या सही,इतना खुद को मत तोलो
कम ांकिते है वो तुमको,उनके व्यर्थ वचनो को मत भूलो
अब हो चुकी है बहुत देर,तुम शोर मचाओ,
चीखो चिल्लाओ,मत गभराओ
गुंगु की आवाज़ बनो ऊँचे स्वर में
इस अंधेर नगर में
हल्ला बोलो
ज़िद्द करे जो ये पलकों की खिड़कियां जबरन इन्हे खोलो
सह चुके हो कितना अब तो इस छुपी से ताले हो तोड़ो
उलझनों में मत उलझो,नाकामियों से न मुँह मोड़ो
शब्दों को तुम बाण बनाकर वाणी के धनुष पर छोडो
कुछ ठीक है ,कुछ ठीक नहीं है,गलत है या सही,इतना खुद को मत तोलो
कम ांकिते है वो तुमको,उनके व्यर्थ वचनो को मत भूलो
अब हो चुकी है बहुत देर,तुम शोर मचाओ,
चीखो चिल्लाओ,मत गभराओ
गुंगु की आवाज़ बनो ऊँचे स्वर में
इस अंधेर नगर में
हल्ला बोलो
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