सियाही का ख़ून कर निखरते है ये लफ्ज़
नोक चुभोकर कागज़ को ज़ख़्मी कर उभरते है ये लफ्ज़
कोई रोकता नहीं इन्हे ,सरेआम क़त्ल करते है ये लफ्ज़
क्यों इन्हे कोई सजा नहीं देता ?
लफ्ज़ो पर लफ्ज़ मरते है
लफ्ज़ो से लफ्ज़ डरते है
फसाकर लफ्ज़ो को लफ्ज़ खुद हे पर हस्ते है
क्यों इन्हे कोई सजा नहीं देता ?
गुनाह सारे लेखक के सर मढ़ते है
बिना हथियारों के वार करते है
हम बेचारों का कहाँ कोई कसूर,हुक्म की तामिल किया करते है
क्यों इन्हे कोई सजा नहीं देता ?
नोक चुभोकर कागज़ को ज़ख़्मी कर उभरते है ये लफ्ज़
कोई रोकता नहीं इन्हे ,सरेआम क़त्ल करते है ये लफ्ज़
क्यों इन्हे कोई सजा नहीं देता ?
लफ्ज़ो पर लफ्ज़ मरते है
लफ्ज़ो से लफ्ज़ डरते है
फसाकर लफ्ज़ो को लफ्ज़ खुद हे पर हस्ते है
क्यों इन्हे कोई सजा नहीं देता ?
गुनाह सारे लेखक के सर मढ़ते है
बिना हथियारों के वार करते है
हम बेचारों का कहाँ कोई कसूर,हुक्म की तामिल किया करते है
क्यों इन्हे कोई सजा नहीं देता ?

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