Monday, February 26, 2018

Darr sa Lagta hai

इन खिड़कियों को अब खोलने से डर लगता है
आसमान को नापने से डर लगता है
बुनने  लगता हु सपनो में तो खोने से डर लगता है
कल्पनाये पिरोने लगता हु जब ,तो खुद को ढूंढने से डर लगता है
चैन से सोना  हूँ पर सोने से डर लगता है
आवाज़ देकर चौंका देती है ये भोज से लद्दी किताबे मुझे
अब तो किताबे खोलने से भी डर सा लगता है
मै कूदकर ,दौड़कर चढ़ जाऊँगा ये सीढ़ियां
पर क्या करूँ नन्हे से है ये कदम ,ऊंचाइयों से डर लगता है



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