Monday, December 2, 2024

Chamkaur ki GadI

 बैठो और सुनो कथा ये गौर से 

शहादत की खुशबू आती है चमकौर से।  


बड़ी मुश्किल थी वो घड़ी 

जान सभी की आफतो में पड़ी।  


ढक्क्न से फरमान आया था 

माना कफ़न में लिपटा मौत का पैगाम आया था। 


हुकुम था सतगुर को की फौजे छोड़े किला और एक भी सिंह का बाल भी ना होगा बांका 

खायी कसम पाक क़ुरान की पर फरीबो का था कुछ और ही इरादा।  


सोच में पढे गुरु गोविन्द की खुदा की कसम कैसे खाएंगे 

हालातो के आगे मजबूर ाचा ठीक है हम क़िला छोड़ कर जायेंगे।  


गीदड़ो की फौजो  ने सिंघो को घेरा 

आ चूका था सामने भेडियो का चेहरा।  


लाल लालम लाल हो गयी थी सिरसा नदी 

नरसंहार पर चीखती ,रोटी पुकारती।  


नजारा देखकर साहिबज़ादों के खून उफनता चला गया 

और कहा पिता से की अब हमे भी दो आज्ञा।  


क्षणभर भी न कुछ सोचा ना  सुना 

माथे चूमकर किया बेटो को विदा।  


दौड़ रही थी दामिनी तन  में सर पर जूनून सवार था 

ये उन मुठी बंद सिंघो का अपने पंथ के लिए प्यार था।  


अंतिम श्वास तक वो लाडे लाखों को मारकर 

गर्वित हुए गुरु गोविन्द अपने वीर सूत वार कर 


वो अजय ,अमर ,अभय 

इतिहास में सुनेहरो अक्षरों से अपना नाम लिखवा गए।  



Sikho se Mulakaat

 हुजूम का सैलाब है उसके डेरे में 

आफताब भी मांग रहा उससे रौशनी ,इतना नूर है उसके चेहरे में 

मालूम पड़ता है की मुकर्रर है वो नहीं पाबंध किसी पहरे में।  


मैं तो उकता गया हो उसका महज़ब टटोलकर 

वो खुदा -राम को रख देता है एक हे तराज़ू में तोल कर 

बेख़ौफ़ कह देता है सभी साफ़ -साफ़ बोल कर।  


लफ्ज़ो के तेज़ तरार बाण चलाता है 

किताब के साथ -साथ किरपान भी उठाता है।  

और तो और दुश्मनो के अंतिम क्षण खुद हे आँसू बहाता है।  


यूँ तो झुका हुआ आसमान है वो , बस जुर्म के आगे शीश कटाता है 

कहते हैं सिख उसे ताउम्र सीखता जाता है

चढ़ती कला में रहता है ,सभी का भला चाहता है।  



Khuda or Main

 बड़े मुश्किलों से तुम मेरे हाथ आये हो 

क्या -क्या चुगली की है तुमने खिलाफ मेरे क्या बात लाये हो।  


यहीं ना की मैं निकट्ठू नल्ला सीधा -सादा हूँ 

जैसे मैं हे राहु -केतु हूँ , खुद की बाँधा हूँ।  


जहां -जहाँ मैंने अपनी किस्मत आज़मायी 

वही हो गयी मेरी हिम्मत दर्शायी।  


और जानते हो ना तुमने मुझसे क्या -क्या नहीं छीना 

घर,अपने,दोस्त,ज़र और मेरी प्यारी मीना।  


यूँ तो तुम मुझसे पीठ कर बैठे हो 

लेकिन मुझे बुरा से भी बुरा वक़्त दिखाकर तुम यूँ ऐंठे हो।  


तुझे रहम नहीं मुझ पर इतना गरूर भी ठीक नहीं 

तेरे हे बनाया हूँ , मैं कोई भीख नहीं।  


अब लगाम दे ज़ुबान पर की मैं तुझे बताता हूँ 

सचाई का सामना करवाता हूँ।  


खूब हिमायती है तू माथे रगड़े हैं मेरे दर पर कोसता है तू हाथो की लकीरो को 

तानाशाहों के आगे झुका हुआ है , खुश करता है अमीरो को।  


मैंने तेरी झोली अवसरों से भरी 

लेकिन सभी कोशिशे रह गयी धरी -की -धरी 


और तू बात करता है दोस्ती ,प्यार की ?

उस नकली ऐतबार की ?


शूकर मना की तुझे मैंने आईना दिखाया है 

नकाबपोशों का नकाब हटाया है।  


ज़रा जल जलती रेत में कटे ,दबे पैरो पर छाले 

उठ खड़ा  हो अब तो मैं भी हूँ साथ तेरे अब तो कुछ कमा ले।  


मैं चाहता हूँ तू हाथ लम्बे कर -कर सारी दुनिया को परोसे 

और मेरे भरोसे मत बैठए जनाब क्या पता भगवान बैठा हो आपके भरोसे।  

Friday, November 8, 2024

Antim Mitra

 एक युग में ऐसा विध्वंस हुआ 

सम्पूर्ण वंश का ध्वंस हुआ।  


विनाश की अँधियाँ घुलती जाती थी 

कोई  काली छप्पर वाली थी जो धरती को पाटती जाती थी।  


सत्य है की घर के भेदी ने ही लंका को ढाया था 

आस्तीन के सर्प थे , अपनों पर शास्त्रों का डंका बजाया था।  


बन वाहिनी कर्ण और पार्थ टकराते थे 

फूटते थे फिर जवालामुखी बन जाते है।  


रथ  के चक्के के चक्कर ने राधे को घेरा था 

छट गया तेजस चहुंओर बस काल का अँधेरा था।  


रक्तनीर में लिपटे कर्ण पीड़ा में करहाते है 

अंतिम सन्देश सुनाने को दुर्योधन को बुलवाते है। 


विद्युत् पर सवार  दुर्योधन युद्ध चीरते चले आते है 

मित्र की ये दशा देखकर घुटनो पर गिर जाते है।  


और ऐसे दृश्य अतियंत दुर्लभ होते है 

मृत्यु बैठी हो  फैन फैलाए और दो दोस्त  गले लग रोते  है।  


हे सखा! तुम्हे से है ये तूच राधे तुम्हारा ही सरमाया है 

तम्हारे कारण हे रण में वीर कर्ण बन पाया है ।  


विश्व विरुद्ध था मेरे कौशल मेरे विराम लगाया था 

जाति पूछते थे मेरे कुल पर प्रशन उठाया था।  


मैं एक था, मै  अकेला था 

मिलकर सभी ने मुझे निचता की ओर ढकेला था।  


सियारो के झुण्ड में बस एक सिंह दहाड़ा था 

आवाज़ उठायी मेरे हक़ वो ही तो  मेरा सहारा था।  


माथे पर तुमने मेरे मुकुट सजाया है 

चरणों की धुल को तिलक बनाया है।  


इस अंग राज का अंग -अंग सम्पर्पित तुम्हे हो जायेगा 

उपकार तुम्हारा ये दास जनमो -जनमो तक चुकाएगा।  


मरण से अभय हूँ परन्तु मैं पछताऊंगा 

बस तम्हारा राज्याभिषेक ना देख पाऊँगा।  


हे सहचर तुम मात्र मित्र नहीं तुम मेरे प्राण हो 

कर्ण तुम जानते नहीं तुम कुरुवंशियों की शान हो।  


मुझ अभागे को ना कोई सुहाता था 

ना समझ कहकर मुझे समझ ना पाता था।  


अहोभाग्य मेरे की महारथी कर्ण जीवन बिता मैं पाया हूँ 

हार गया हूँ सभी से कम -से -कम मित्रता निभा मै पाया हूँ।  


निश्चिन्त रहो बंधू तुम्हारी मृत्यु व्यर्थ ना जाएगी 

ये अंतिम यथार्थ सुखाता है इतिहास में दर्ज हो जाएँगी।  








Ram nahin ab Ayenge

 तम खड़े हुए हैं वो मेरे प्रभु हैं 

संशय में पड़े वो मेरे प्रभु है।  


हम विघ्नो को काट -पाट लौटें हैं अब 

कोई उत्सव नहीं ? कहाँ गए हैं सब ?


हे कमल नयन हे रघुवंशी 

तीनो लोकों के नायक , विघ्नो के विध्वंशी।  


ये कलयुग है यहाँ माला दीपों की ना सजाते हैं 

आइये प्रभु देखिये कलयुग वासी कसिए दीपावाली मनाते हैं।  


धनुष बाण तनाकर दोनों भाई तन गए 

जब अँधेरे  में कारतूस के बम बन गए।  


अग्नि वर्षा बरस रही आकाश से 

विनाश मिल रहा हो विनाश से।  


क्षणभर जलते थे फिर राख हो जाती थी 

उसके राख से वसुधा ख़ाक हो जाती थी।  


मानुष हे अनिला में विष घोल रहा है 

दृष्टिहीन होकर अपने कर्तव्य भूल रहा है। 


अधिकारी बन वो भी यूँ ऐठा है 

नहीं जनता वो भीष्म अपराध कर बैठा है।  


कोलाहल से जीव -जंतु छिपते , बिलगते रोते है 

पूछते है प्रभु से क्या मानव ऐसे होते है।  


चिता पर पड़ा  विवेक अपनी अंतिम श्वासे गिनता है 

और इस लोभी प्राणी को बस अपन धन की चिंता है।  


विनती करता हूँ अपने आशीषो से ज्वलित एक बार ज्योति अंतर्मन में 

कृपा कर सुना दो फिर से गीता का सार अपने जन में।  


हताश हो चल दिए सिया ,राम लखन संग वानर सेना 

जहाँ आस लगाए बैठा ना हो दास कोई वह दर्शन क्या ही देना। 


गंभीर होकर सोचो वासियो यदि हम यूँही प्रकृति संग खिलवाड़ करते जायेंगे 

लाख करलो फिर तुम जतन राम लौट ना आएंगे।  




Wednesday, October 9, 2024

Kaikeyi Ka Shok

 कोप भवन की काल कुटी में 

कर्कश करती कैकेयी त्रुटि में।  


रिक्त नेत्र बता रहे है 

स्मृति राम की सत्ता रही है।  


कालचक्र था गति पकड़ता 

पछतावे का पारा पड़ता।  


अपने वचनो की चिता सजाती है 

तीनो लोक बैठे है मौन कैकेयी शोक मनाती है। 


हे राम तुम तोड़ पिनाकी दुखो का हरो मेरे संतापों को 

यदि ना हो सके बुलकारो यमदूतो को भस्म करो पापो को।    


हे लखन लो खडग और काट दो मेरी जिह्वा को 

विषकंठ का श्राप मुझे है काट दो मेरी ग्रीवा को।  


मुझे अभागन ने माँ  होकर क्या ही पाया है 

कुमताओ की श्रेणी में श्रेष्ठ स्थान मिल पाया है।  


शंखनाद के साथ -साथ गजराजों का गर्जन हुआ 

अशोक हो जाता है शोक जब भवन में सियाराम का आगमन हुआ।  


तम में सोई पटरानी नयनो से नयनो ना मिला पाती है 

अश्रुओ से धोती चरणकमल को कर्मो  पर पछताती है।  


विलम्भ अविलम्भ ना खोते है बस सीने से लग जाते है 

माँ के सामने भगवान भी बालक बन जाते है।  


शमा याचना करती कैकेयी पर अंकुश लगाते है 

लाड़ लगाते है सारी लीला समझाते है। 


क्या कहूं तुम्हे माँ तुम बिन कैसे रह पाया हूँ 

शतकोटि नमन करता हूँ तुम्हे ,कारण तुम्हारे हे जनम सफल कर पाया हूँ।  


पाषाण ह्रदय कर तुमने कैसे ये कदम उठाया होगा 

पुत्र मोह का द्वन्द तुमने कैसे मिटाया होगा। 


तुमने आहुति दी स्वयं की विषपान किया 

ांसि पोंछो माँ तुमने ममता का सम्मान किया।  


फिर क्यों हम आधा सच ही दिखाते है 

बिन समझे -सूझे ही बात मान जाते है।  


प्यारे श्रोताओं पढ़ो , परखो और पहचानो 

तर्क करो सत्य को जानो।  

Friday, October 4, 2024

Badge of Rejection

The results are out, I’ve won the flunkee's election.

Applause!! For they’re going to honor me with a badge of rejection.


Pins after pins, pinned against my chest,

Ah! The colors of defeat—I'm supremely impressed.


The shades of ribbons, so I could recall

The deeds I did and tell you all.


For instance, the tones of Bloody Mary red

Remind me when I overdosed on heartbreak, and they announced me dead.


Witch’s purple—friendship’s twisted turn,

A serpent’s coil, my heart’s demise to earn.


The soaking, sticky, slimy, shiny green

Is of the time when time was mean to me.


The darker hue of brown they fill,

When gore oozed out and ran still.


How could you forget the jazzy blues,

I bribed sadness so I’d have someone too.


Silverless gray, a bleak and barren land,

Where joy once bloomed, now a withered hand.


Alas!! My true color, and last but not least, the vantablack,

Finally pleased me as I arranged my trophies of gloom on the rack.


I must be grateful to the dust I tasted, the mornings I hated, and the list goes on,

I’m the queen of losers, flaunting in my ignorant cape, dejection my crown.


Monday, September 30, 2024

Prem Ki Paribhasha

 बड़ा तुम इतरा रहे हो 

खुद को बड़ा प्रेमी बता रहे हो।  


बहुत उड़ लिए तुम्हे ज़मीन पर मैं लाती हूँ 

और खंडित कर ढाई अक्षर का मैं पाठ पढ़ाती हूँ।  


रचा प्रथम अध्याय प्रेम का वो पहले से भी पहले थे 

तीनो लोको के आदर्श वो नहले पर दहले थे।  


वर वो जो अनंत अनेका अविनाशी है 

और मरघट का वो वासी है।  


भस्मे रगे, नाग सजे और गले में मुंडो की माला 

चंद्र चूड़ामणि बन श्रृंगार कर जटा से बहती गंगधरा।  


बैठे सिंहासन पर वो बागम्बर 

सहज सरल श्वेत वो बीन कोई आडम्बर।  


हर -हर का आवाहन कर हर संकट टल जाते है 

महादेव के होने भर से निश्चय अटल हो जाते है।  


वधु वो जिससे स्वयं सौंदर्य और सुन्दर हो जाता है 

समक्ष ब्रह्माण्ड शीश निवाता है।  


जो तप में तप रही मनाना उस वैरागी को 

आंख मूँद कर बैठे जो वो परम त्यागी को।  


भगवती संसार कलयाणी है वो  माँ जगदम्बा 

छप्पर वाली काली है वो शेरांवाली माँ अम्बा।  


अर्ध अंग है गौरीसा 

देखा है तुमने प्रेम ऐसा ?


और कुछ आसान नहीं सब तप कर ही पाया है 

ईश्वर का प्रेम भी सदियों बाद सम्पूर्ण हो पाया है।  


अठखेलियां है उनकी भी वो रूठते -मनाते है 

हाँ एक बात है शिव शक्ति अंत तक साथ निभाते हैं।  


पढ़ो पाठ प्रेम का उमा शंकर से 

प्रेम चाहे गहरी लंगन नहीं होता ये क्षण भर से।  


Keep an eye on me


Umbra coils around me, a suffocating embrace.
The more I gasp, the less air I seize.
I swallow my withering breath under fear's bed 
Demoniac doubts dance wildly, and finally, I'm dead 

A sudden pause in their jubilation,
A regretful interruption.

Uninvited, unannounced,
The colossal, burning ball of helium rebound 

Your radiant, infinite hands reached in,
Shaking the cradle where I’d been confined.

The heat stroke, a feathery brush against my skin,
A seismic upheaval awakens within.

My shutters burst asunder, life explodes in every view,
A phoenix rising from the ashes, born anew.

On high alert, her hounds she dispatches,
You become my guardian, my steadfast matches.

The unforgiving, scorching fever pursues them behind her cloak.
The hunter is now the hunted, no escape to invoke.

As I ascended to my feet,
Darkness felt trapped and couldn’t compete.

She tried to expand her dark domain,
But Helios outshone her, a celestial chain.

The treacherous clouds dissipated and vanished,
The sun gleamed brightly, exhilarated.

I knew you wouldn’t silently attend my funeral,
I sensed you had cosmic plans for me, a stellar duel.

Oh, eternal light in the sky,
I bow to you forever, your watchful eye.



Tuesday, September 24, 2024

Humein Bulao

 शुन्य शैया पर सोया सड़ता अँधेरा 

कतरा- कतरा निघलता गहरा -गहरा।  


लाली लालिमा लहु की फूटी 

जब डोर जीवन की टूटी।  


सम्पूर्ण सृष्टि ने संग में हुंकारा 

त्राहि -त्राहि कर माँ शक्ति को पुकारा।  


अश्रु अविरल ैवेघ में उफान मार रहे थे 

और विरोध में खड़ा था पुरुष उसकी बनाई लकीरे जो लांग रहे थे।  


रक्त लीला में रमी वो खुद को रंग रही थी 

आवाहन शक्ति कुछ इस ढंग से कर रही थी।  


आँखों में एक अजीब सी आशा लिए वो दम भर रही थी 

विलुप्त होना चाहती है , वैसे भी जीते जी भी मर ही रही थी।  


बाहों को बड़ा -बड़ा कर वो बनाती पौड़ियाँ 

जो थी पाँव की जुत्तियाँ दो कौड़ियाँ।  


चील सी चीख चीरती हुई सन्नाटे को "माँ !!! तुझे छोड़ सिंहासन आना ही होगा "

कौन है अधिकारी वसुधा आज तुझे बताना ही होगा।  


हम तो लहराती फैसले हैं , हमे दबोचा,उखाड़ा , काटा , कुचला जा रहा है

ये नर स्वयं को त्रिलोकीनाथ बता रहा है।  


इत्रा रहे ये त्रिदेव के अंश सत्ता जो इनके पास है 

अब इन्हे कौन बताये? कौन जगाये ? इनके इष्ट हे देवी के दास है।  


चरम सीमा पर है दरिंदगी , खुल आम फिरती है हैवानो की टोलियाँ 

सजी पड़ी है अर्थियां फूलों की और खाक हो चुकी है डोलियाँ।  


तुम आकर पाट दो पापियों के रक्त से भो को 

तुम ही तो सर्वगुण समपण स्वरुप हो।  


इस दूषित दुनिया में अब और ना रह पाएंगे 

शपथ है तुम्हारी अब और विलम्ब ना सह पाएंगे। 


उन्मुक्त करो हमें माँ शीग्र अति शीग्र तुम चली आओ 

गर आने में हो दिक्कत तो हमे समीप बुलाओ।  

Thursday, September 19, 2024

Sabr Karo Mere Yaar

 कस ली है ना तुमने फंदे की गांठे 

इससे पहले तुम चल बसों सुनते जाओ मेरी बाते।  


मैंने पूरे इतिहास को खंगाला 

और फिर ये निष्कर्ष निकाला।  


इससे भोगना पड़ता है अनंत तक संताप 

आत्मघात है सबसे श्रेष्ठ पाप।  


और तू क्या समझता है सीधा भगवान् के पास पहुँचजायेगा 

मन मर्ज़ी ईश्वर से शिकायत लगाएगा।  


तू तो बस यूँही लटका रहेगा 

ना मिलेगा मोक्ष माया में भटकता रहेगा।  


हां मैं तेरी सभी समस्याएं जानती हूँ 

और तेरी व्यथाओं को पहचानती हूँ। 


कर प्राणो का हरण जब रावण ने प्रहार किया 

क्यों  ना  मोड़ धनुष को राम ने खुद पर हे वार किया? 


क्यों ना बिछाई कृष्णा ने स्वयं की शर शैय्या 

जब छूट गयी नगरी , मुरली, वंश,राधा और मैया।  


जब गुरु नानक के पीछे लोग पत्थर लिए भागे 

क्यों नहीं उन्होंने प्राण वहीं त्यागे।  


जब गोविन्द ने वार दिए थे अपने लाल 

क्यों नहीं उठायी किरपान खुद पर क्या उन्हें नहीं हुआ मलाल ?


अपनों ने ही अपनों पर घात किया 

अब बताओ इनमें से कितनो ने आत्मघात किया ?


तुम्हारी धम्मीयो में बहता  रक्त इनकी ही तो निशानी 

अब बताओ किस बात की परेशानी है ? 


ये ज़रा सी हवाओं से तुम यूँ डोल रहे हो 

"मरना चाहता हूँ मैं " तुम ये बोल रहे हो।  


दीपक हो तुम जो अँधियो में जला करते है 

क्या पर्वत भी लेहरो से डरा करते है ?


दिशाओ दोगे तुम , तुम्हे मार्गदर्शक बनना होगा 

प्रतिनिधि बन सभी का तुम्हे रण में उतरना होगा।  


इस रणभूमि में जो विचलित मन पर विजय पायेगा 

पताका चमकेगा उसी का वो चक्रवती कहलायेगा।  


आशीषो का सावन होगा 

तुम देखना दृश्य बहुत पावन होगा। 


ह्रदय को मजबूत बनाओ 

संकटो के समक्ष दिवार बन तन जाओ। 


अब भी समय मत मानो यूँ हार 

ज़िन्दगी बहुत बड़ी ज़रा सब्र करो मेरे यार।  

Saturday, September 7, 2024

Meghon Ka Naath

 राक्षस कुल का प्रज्वलित  अंगार 

चर्चा जिसके चरित्र पर हुई नहीं विस्तार। 


कालिख पोत -पोत कर  उसे नहलाया गाया 

अवगुणो की मुहृत उसे दर्शाया गाया।  


बुराई का नाम देकर जिनके पुतले  वर्ष दर वर्ष हम फूंक आते है 

राख समेट -समेट कर क्या सच में उन्हें जान पाते है।  


षटकोटि नमन दामिनी पर सवार  मेघो के नाथ को 

षटकोटि नमन जो टालते नहीं थे पिता की बात को।  


तम के झूलों में झूले वो वारिस अंधकार के 

थर -थर कांपे धरा उनके एक हूंकार से।  


माया के प्रजापति वो दैत्यता में अधीन 

पिता के अभेद्य कवच पितृ मोह में विलीन। 


विश्व ने उन्हें धुतकारा 

जब उनके वार ने लक्ष्मण को मूर्छित कर डाला।  


रण की रज में रौंद  योद्धा घर को आया 

सीने से लगाकर माँ  ने खूब लाड -लड़ाया।  


"अब भी कुछ नहीं बिगड़ा " संधि का प्रस्ताव वो बढ़ाता रहा 

"आम मानुष नहीं है हरी के अवतार " इंद्रजीत पिता को समझाता रहा।  


अफ़सोस की सम्राट अँधा,गूंगा और बहरा हो चूका था 

विवेक अपना खो चूका था।  


चरणों में गिर माँ ने की मिन्नतें , "भगवान के विरुद्ध शास्त्र तू क्यों उठाता है ?"

"क्यों मेरे प्राणो की बाज़ी यूँ तू  लगाता है ?" 


ढांढस देकर  मेघनाथ बोले , "शूरवीर रण से ना मुँह छुपाते है "

मारते है या स्वयं मर कर आते है। " 


ये मेरा कर्म -धर्म इसे मैं निभाऊंगा 

पिता की अवज्ञा कर स्वर्ग में भी पाताल पाऊँगा। 


अब की पारी में लखन खड़े थे मृत्यु को लांग कर 

धनुष पर तना तीर को तान कर।  


बाणो की वर्षा में वीर मयूर बन जाते है. 

तांडव कर मृत्यु का कृपाल बजाते है।  


फिर ऐसा भूचाल हुआ 

प्रलय का हाहाकार हुआ।  


मौन हो गयी वसुधा 

मेघनाथ बेहाल सा  गिरा।  


नींद में वो मंद -मंद मुस्काते थे  

राम, लखन और वानर सेना सभी शीश निवाते  थे।  


 जिन्होंने इंद्र को जीता 

आखिर उनका अंतिम क्षण कैसे बीता।  


कहा यम ने की भले ही तुमने पकड़ा अधर्म का हाथ 

पर अंतिम दम  तक पिता को माना अपना नाथ।  


जय -पराजय तो बात है बाद की 

याद रखेंगी तुम्हे पीडियां तुमने पुत्र की परिभाषा सजा दी।  

Saturday, August 24, 2024

Vardaan Ho

 हे पौरुष अब से हर शक्ति को ये वरदान दो 

अब से हर देवी सीला ,शील ,पत्थर पाषाण हो।  


तुम्हे ारियो -कुल्हारियो से फोड़ा जाये 

और जो बची -कूची हिम्मत है उसे हथोडियों से तोडा जाए।  


तुम्हारे अंश पत्तर-कंकड़ को  भी न आराम मिले 

मसल-मसल कर मिट्टी में हे विराम मिले।  


पुरुष को उत्तम बनाने में तुम्हे हे तराशा जाए 

टक -टकी लगाकर देखो तुम सितम तुमपर बेतहाशा जाए।  


 कुछ इस प्रकार से हो श्रृंगार तुम्हारा 

मौन और बहती अविरल अश्रुधारा।  


तुमपर ऋतुओं का ना कोई असर न हो 

विचलित रहो तुम सदा ही कभी निडर न हो। 


कालिख भरी काल कोठरी में तम्हारी जंग लगी आंखे 

सड़ती लाश सपनो और बाहे तुम्हारी सुखी शाखे।  


हे पौरुष अब से हर शक्ति को यही  वरदान हो

क्यूंकि मैं नहीं चाहती की नारी बस कहने के लिए महान हो।  


ऊब चुकी हूँ मोमबत्तियों से जलती चिताये देख कर 

हार चुकी हूँ निहथि देवी की व्यथाएं देखकर।  


हमे ने हे छीने हैं शक्ति से उसकी खडग, ढाल और भाला 

वार कर स्त्री पर हमने सृष्टि को उजाड़ डाला।  


अब जो असुर विकृति पर चल रहा ये विश्व तो यूँ जीना हे होगा 

इस विष मंथन से निकला हलाहल हमे पीना हे होगा।  


कुकर्म, कुधर्म में पल रहा है आज का मानव 

धित्कार है ये मानव ये है परम दानव।  


ये जो अपने पौरुष में विलीन है 

भूल चूका है की स्वयं शिव शक्ति के आधीन है।  


जब सौम्य गौरी दुर्गा, चामुंडा काली खप्पर वाली बन जाएगी 

 मूली सामान मुंडो को काटती जाएगी। 


प्यास भुझेगी उसकी पापियों के रक्त पान से 

तू क्यों न्योता दे रहा है विनाश को बात सुन मेरी ध्यान से।  


अब से नारी का सम्मान तेरा पहला धर्म होगा 

उसके सपनो को देना उड़ान तेरा  पहला कर्म होगा।  


अगर स्त्री है रूप है देवी का तो तुझे परिचय राम का देना होगा 

संचार कर सृष्टि का तुझे मर्यादा में रहना होगा।  


तू चले जो इस पथ पर तो रास्ते  देंगे पर्वत और अस्समान झुक जायेंगे 

गर होगा विफल तू सारथि स्वयं भगवन बन जायेंगे।  


हे पौरुष अब से किसी नारी को ना ये वरदान हो 

अब से ना कोई देवी शील,पत्थर ,पाषाण हो।  






  

Tuesday, August 20, 2024

Rona Ravan Ka

 सुना है वो आया है 

जो देवी को हर कर लाया है 

साम -दाम -ढंड -भेद करके भी 

उसकी परछाई को भी न छू पाया है।  


ये बाते जब रावण का कानो में पड़ी 

मच गयी फिर खलबली 

पिघले पर्वत आँखों से और बहने लगी अश्रुधारा 

त्राहि -त्राहि कर उसने तीनो लोको को पुकारा।  


हाँ -हाँ मैं सब मानता हूँ 

अपने पाप को बाखुभी पहचानता हूँ 

लोभ मेरा सार्थी था अंधेरो पर मैंने राज किया 

अपने पंजो से नोच -नोच कर अपने भाई का राज पाठ हङप लिया।  


वासना की बातो में आकर मैंने खुद को यूँ बदनाम किया 

स्त्रीयो का मैंने अपमान किया। 

गुनाहो का देवता हूँ मैं , झूठ की मैं मुहृत हूँ 

गिद्ध चिथड़े कर गए है जिनकी लाश से भी बत्सुरत हूँ। 


लेकिन उनका क्या जो राम की मौखटे लगाते है 

राम -नाम की आड़ लेकर ना जाने कितने अपराध छुपाते हैं

आजकल रावण ही रावण को जलाते है।  


याद रहे मैं वहीं हूँ जिसने शीश काट-काट कर शिव को मनाया था 

चहुवेद का ज्ञान जिसकी रग -रग में समाया है।  

अंतिम श्वास में लक्ष्मण का पाठ पढ़ाया 

और जिसे तारने स्वयं हरी ने अवतार लिया आया था।  


आज अपने अंतर्मन में झांको 

तोल -मोल  कर देखो कितने राम और रावण हो ज़रा खुद को नापो।  





Monday, August 5, 2024

Hind Di Chadar

 सिखों का है बस एक ही असूल 

की पहला मरण कबूल 


जिन्होंने शहादत को परिभाषा दी 

कथा है ये हिन्द दी चादर की 


अपने लिए मरे सो पर वो हो जाते है अमर जो दूजो के लिए लड़े 

नमाज़ो और जनेहु से दूर वो थे बस इंसानियत के साथ खड़े


सताये हुए जो उनके दर पर पहुंचे 

जिनके अस्तित्वे थे सिरफिरे गिद्ध ने नोंचे 


व्यथा सुनाते अपनी वो  रोते - रोते  "हे तेग़ बहादुर राइ ,

हमे बचाओ की अब हमारी लाज पर है बनआयी "


सोच में सभी थे डोले 

चुपी तोड़कर बाल गोविन्द बोले 


"आप सम्भारो इन्हे , आप ही हो पालनहार 

आप ही हो नानक जन की लाज रखो करतार "


ढांढस नहीं उन्होंने हिम्मत थी बड़ाई 

और बेटे की बाते सुनकर पिता की ऑंखें थी भर आयी। 


यहाँ सिंघो का एक जथा तयार हुआ 

और वह दिल्ली में एक पागल कुत्ता खूंखार हुआ 


अपने प्यारे सिंघो संघ श्री तेग बहादुर जी को बंधी बनाया गया 

और औरंगज़ेब के सामने लाया गया।  


वो चेहरों पर चेहरे लगाता रहा 

खुद को खुदा का बंदा बताता रहा 


भेड़िया नज़र आ रहा था भेड़ की खाल में 

छुपा जा रहा था वो झूठ की ढाल में 


वो अँधेरा था उसपर रौशनी का कोई असर न था 

जिन्दा पीर था वो उसे कोई डर न था 


सोचा उसने की लालच तो है बुरी बला लेकिन इस बला से कौन बचा है 

पर  मूरख  था  स्वयं  परमात्मा वो देने लालच चला 


जब नाकाम हो गए आज़माये हथकंडे 

ढोल पीटा उसने बजाये डर के डंडे 


हुक्म जारी किया गया 

इस्लाम या मौत आखरी अवसर दिया गया 


सभी ने सहमति से  ठुकराया 

उबला  खून औरगंजेब और भौखलाया 


बीचो बिच चीर दिया ारियो से भाई मति दास को 

और रोई में लपेट कर जला  दिया भाई सती दास को 


बेशिकन बस वाहे गुरु का नाम उचारा 

और उबाल -उबाल कर भाई दयाला को मारा 


अब बारी थी उस संत फ़क़ीर की 

जिनसे खींची दी थी मानवता की 


अड़िग थे वो अपने निश्चय के पूरे पक्के थे 

देखकर कर ये सभी हक्के -बक्के थे 


एक चौपट राजा ने सभी का जीना मोहाल किया 

हिन्द की खातिर श्री तेग़ बहादुर जी ने शीश कटवा दिया 


 दिल्ली की खून हवाओं में सन्नाटा उथल -पुथल रहा था 

कोई मदमस्त हाथ अंधेर नगर को कुचल रहा था 


इतिहास को हम हर बार हे दोहराएंगे 

तानशाहों के आगे न कभी शीश निवायेंगे 


तुम भी कमज़ोर की दिवार बन जाओ 

और गज क्र फ़तेह बुलाओ!!!


वाहे गुरु जी का खालसा 

वाहे गुरु जी की फ़तेह 




Wednesday, July 17, 2024

krishna Janamashtmi

 अंधेरे पर विजय का गान

जब धरती पर पाप छाया,

मानव तन, छाया से घबराया।चारों ओर हाहाकार मचा,

दरिद्रता ने अपना डंका बजाया।


इंसानियत मर गयी थी,

तड़पती धरती ने पुकार मची थी।नारायण ने सुनी पुकार,

किया धरती का उद्धार।


आकाशवाणी सुन कंस कांपा,

काल का डर उसके मन में छाया।अंधेरे में उसने अपना भूल दिया,

देवकी की संतान मारने का कसम खा लिया।


समय था गंभीर, सब इंतजार में,

वो क्षण था परीक्षा का, वो क्षण था क्रांति का।


टूट गयी बेड़ियाँ, खुल गए कारागृह के ताले,

बरसा सावन, गरजी दामिनी, जगमगाए धरती-आकाश के हाले।


विराजमान हुए वासुदेव, फन फैलाए नाग,

यमुना नदी ने चरण धोए, बहाए प्रेम के झाग।


धरती-आकाश मंगल गान गाए,

ईश्वर के जन्म पर जयकार लगाए।


माया का अंत, काल की पुकार,

कंस का समय हुआ निकट, विनाश की हुई तैयारी चारों तरफ।


यशोदा रूठी, नन्दलाल मनाए,

अठखेलियाँ करे, मोहन का मुख निहारे।


मंद-मंद मुस्कान, लीलाएँ अपार,

राधा संग रास रचाए, जग को मोहे प्यार।


गोवर्धन को उठाकर, इंद्र को सबक सिखाए,

गोवर्धन पूजा की रीति, गाँव-गाँव फैलाए।


कंस का अत्याचार, हुआ सब बेकार,

अखाड़े में उतरे कृष्ण, किया कंस का संहार।


अंधेरा मिटा, मुक्ति मिली,

जग में गूंजा जय श्री कृष्णा का गीत नया।


यह कथा है कृष्ण जन्माष्टमी की,

प्रेम, विजय और भक्ति की।


हर घर में दीप जले, मनाए जाए यह त्यौहार,

कंस के अत्याचार का हो नाश, यही है हमारी पुकार।








Saturday, July 13, 2024

Thank God i don't believe in you

 Thank God I don't believe in you

excuse me? you don't believe in whom 

At deities and saviors, make-believe.

No ultimate being, no grand design,

Just science's whispers, the Big Bang's shine.


But wait, when shadows grip you tight,

And darkness swallows all your light,

Don't silent pleas escape your lips,

A whispered prayer, a soul that grips?


In moments unseen, where no eyes pry,

Don't hands reach up, a silent sigh?

A flicker of hope, a yearning deep,

For solace found when burdens sleep?


We scoff at dogma, wear our doubt,

Yet yearn for something, scream and shout.

Perhaps a power, unseen, unknown,

A guiding hand on which we're sown.


So wear your mask, your reason's crown,

But deep within, when feelings drown,

A primal fear, a whispered plea,

A God you doubt, yet deep believe.

Friday, June 28, 2024

Hanumant


राम -नाम की सरिता में केवल हनुमन्त बहते है 

जहाँ -जहाँ पग  पड़े राम के ,

वहीं  हनुमंत रहते है।  

स्वयं की स्तुति में बंधे नहीं है , जय सिया राम ही कहते है  


अहम् -क्रोध का बोध नहीं है 

कोई  शोभ नहीं ,कोई लोभ नहीं है 

श्वेत आत्मा है वो उनसे डर भी डर कर रहते है।  


निर्बल को वो बल हैं देते  

हर मुश्किल का हल वो देते  

होने से उनके संकट संकट नहीं रहते है। 


अञ्जनजए हैं वो केसरी नन्दन माँ जानकी के दुलारे है 

हर श्वास में राम -राम वो राम को भजने वाले है 

और राम बसे है हम सब में लेकिन एक वो है जो राम में बसने वाले है 

पर अपना परिचय बस राम भक्त ही  कहते है 


विपदा काल में  बन पहाड़  तन जाते है 

हैं असीम अनंत आकाश है , अपनी ऊंचाई कहाँ नाप पाते  है  

राम में खोते है खुद को वो राम में खुद को पाते है 

राम  में रमे -रमे वो राम रंग में रहते है। 

The Animal Kingdom Strikes Back

 On news that chills you to the bone,

A creature's parliament takes its throne.

The gods deserted, a heavenly flight,

Garuda and Vasuki, lost to sight.


No Nandi on Kailasha, the swans have flown,

Devraja himself walks, with a weary groan.

Airavata missing, a terrible plight,

The animal kingdom demands its own right.


With thundering hooves and a lion's roar,

They burst through the doors, a plea to implore.

"Forgive our absence," a somber decree,

"An eviction notice, a desperate plea."


"For extinction we beg," a voice filled with woe,

Mother Earth trembles, a world in slow throe.

"Why this death wish?" the council inquires,

The creatures respond, with eyes filled with fires.


"Our foe walks on two, with a heart filled with greed,

The lion, the king, for a trophy they bleed.

The elephant's tusks, a barbaric display,

Dinosaurs' scales, for fashion they flay."


"For fur and for baubles, the bunnies they fall,

Guinea pigs perish, to answer fashion's call.

The dogs, loyal friends, tortured to their core,

Mosquitoes like dust, scattered on the floor."


"Our leader is lost, our kingdom in tatters,

We hunt for survival, not trinkets and matters.

They hunt for amusement, a hunger obscene,

A world without nature, a desolate scene."


Imagine the silence, the skies stripped of song,

No whales in the oceans, where creatures belong.

No ships in the deserts, a life-giving drain,

Unless we see reason, and end all this pain.


This Earth is a gift, not a prize to be claimed,

Let logic and reason, for nature be named.

A revolution brewing, a desperate plea,

Save Mother Earth, let her beauty run free!



Sunday, May 5, 2024

Kathghare mein Shakuni

धुंध में लंगड़ाती हुई परछाई

लंगड़ाती-लंगड़ाती सामने आई
"नहीं" चीखती चल
विद्रोह की थी वो चीख

"मेरे हुज़ूर, My Lord मेरे सरकार
हो जाए अनहोनी, अनर्थ हो जाए कह कर अगली बात
वाणी को दे विराम

मैं आपके आगे शीश झुकाता हूँ
मैं कुछ कहना चाहता हूँ।

वो डगमगाते-लड़खड़ाते हुए
कठघरे में खड़े
माफ़ नहीं करेगा इतिहास मुझको
भांजे गर न कहता मैं ये बात तुमको

माना मैंने कार्यवाही की गरिमा भंग की
पर गौर सुनिए ये बात ढंग की

ये जो हृष्ट-पुष्ट वृक्ष मेरा दुर्योधन बना है
मेरे क्रोध में ही रमा है।

मैंने अपने मन में उफनती अग्नि पिलाई है
विष के उपवन में मैंने करी इसकी सिंचाई है

और ये तो कुछ भी नहीं है
मेरे आसक्त की कोई हद नहीं है

मैंने खुद ही ब्रष्ट की बुद्धि तुम्हारी, अंधे तो बहुत है
लेकिन भांजे तुम्हारी तो दृष्टि ही नहीं है

कसूर इसका कुछ भी नहीं है, ये तो बस मेरे हाथों की कठपुतली है
मैं हूँ नाथ, रुख तुम्हारी मैंने बदली है

मैं अपनी कथा सुनाता हूँ
इस लंगड़ाते शकुनि की व्यथा सुनाता हूँ

आँखों का तारा मैं अपने पिता और भाइयों का लाडला था
इन कुरुवंशियों ने उन सबको एक-एक कर मार डाला

पिता की अस्थियों से बने पासे मैंने जहां फेंके
धराशायी हुए, धुरंधरों ने माथे टेके

आहुति दी मैंने अपनी बहन, अपने वंश की
और सौगंध रण की उठा ली

ये महाभारत कुछ नहीं बस मेरा रचाया
भाई को भाई से लड़वाया।

सब ने खोया किसी को, रण में सब अधूरे थे
एक मामा शकुनि थे जो वंशहीन होकर भी पूरे थे

बेचारे कौरवों ने बातें मेरे ही मानी
पर इस नरसंहार की नहीं है मुझे ग्लानि

अब मैं बेइज़्ज़त बरी हूँ या फांसी मिले ये तो कुछ तय नहीं
आंख के बदले आंख कटे मुझे अब कोई भय नहीं।

Monday, March 18, 2024

Perks of being a time traveller

 


Since time's first tick, it's held us in thrall,

A mystery tempting, a question for all.

What if we grasped it, and twisted its flow?

I'm Professor Temporal, let the rhyming show!


A nightmare unfolded, a voice boomed with fear,

"Prove me wrong, or be banished!" it echoed so clear.

Evidence scoffed at, the King wouldn't see,

Unless with his own eyes, the truth set him free.


Without hesitation, I dismissed my young crew,

King Snoutsword the Third, with his pointed view

(A snout like his father's, and grandfather too).

He wrinkled his nose, a challenge he threw:


"Chocolate's a hoax," he declared with a snort,

"Prove me wrong, or be banished from court!"

A bar from my pocket, I offered with glee,

His monkey-like hands snatched it hungrily.


"Clever attempt," the King scoffed with a frown,

"But seeing is believing, turn this legend around!"

With a snap and a twist, the court dissolved,

A bustling marketplace brightly evolved.


Mayan-Aztecs figures emerged, in garments so old,

Cracking cacao pods, a bitter brew they hold.

"This isn't quite chocolate," I calmly explained,

"The King's first test, his smugness restrained."


"Aztecs hold it dear," I rhymed,

"Xocolatl they call it, a gift born of time."

The King, though impressed, with doubt in his eye,

Demanded a challenge that soared to the sky.


"The Big Bang's a fable," he boomed with a sneer,

"Prove me wrong, or your fate shall be near!"

Darkness descended, a snap and a boom,

The universe birthed, dispelling the gloom.


"The Big Bang!" he whispered, in reverent awe,

Witnessing creation, a celestial law.

From chaos and swirling, came stars burning bright,

Galaxies forming, a glorious sight.


The King, humbled at last, by the cosmos's might,

Professor Temporal's wisdom, a beacon so bright.

From scholar to hero, a champion did rise,

A confidante to the King, beneath painted skies.


The future unveiled, a persuasive art,

But lessons abound, that touch every heart.

So the spotlight dims, with a final, sly wink,

Professor Temporal, time's master, don't blink.

Thursday, February 29, 2024

Metro

 बंद थे, दबे-कुछले,

आखिरकार तंग रास्ते गलियों से निकले।

ये सपने कूदते-फांदते,

ये सपने दौड़ते-भागते पहुँचे।


मेट्रो के स्टेशन पर,

वक्त की दौड़ में वक्त को पिछड़ाते।

मयान से निकली तलवार, ये तेज़-तरार,

यहाँ सभी हैं समान,

और सभी का होता है सम्मान।


मुझे मेरी मंजिलों तक पहुँचाती,

मेरे सपनों को सच कर दिखाती।

धन्यवाद दिल से, दिल्ली की मेट्रो,

दिल से ही है तुझे सलाम।

Friday, January 26, 2024

The Naked Flower

  

From the seed, I flutter free,

Morning glory, a dance with glee.

Aquatic veins with life inflamed,

I ride the wind, and danced along the rain


In full bloom, clouds cast a gloom,

Shadows stretch, a relentless loom.

Plucked away from my vine, my kin,

I clenche tight, as he caves me in.


I prayed and prayed and prayed to end this cruel scheme 

Reality bites, a nightmarish stream.

His thumb encircles, I gasp for air,

Defenseless blossom, caught in despair.


A python's grip, a relentless twine,

He tears away, my petals decline.

Clawed fingers pinch, I hide my hand, my legs my  face,

Behind the drapes, in a darkened space.


Each petal stolen, a cruel display,

Reduced to nothing, a bud in dismay.

Blades of his claws, a wiggling sin,

Mushed and smashed her, his hardened skin


No alarms rise, no voices swell,

As I’m trashed, to be trodden, farewell.

A naked flower, once held so strong,

Now just a memory, in silence, belongs.




Tuesday, January 9, 2024

Man of my Dreams

 Dear Cinderella,


I’m striving to be lyrical,

For I owe it all to you; last night was magical.

Every hour, minute, and second, every split moment intact and frozen in my mind,

Piercing through the crowd, meeting eyes,Paralyzing time.


The ballroom, our own milky way,

We were rogue planets waltzing & sway,

Dancing in a differentiated romance,

Blurring boundaries in a trance-like trance.


For once, I was whole, complete,

Coiled up in unity,

Until the collision,

Shattering my delusions,

And the Majesty proclaimed,

"You disgrace, bringing shame to my name."


But oh, so gracious of you,

The one he approves,

To become my voice, take my stand,

You gave away my hand in his hand,

"Why can’t a man love another man?"


You advocated my case against the forbidden rule,

The prince charming indeed in love with another duke,

You roared out that love sees nothing and no one,

It wasn’t planned, it simply happens.


And we won. unable to gather what sounds, syllables or words to use

so i utter the only fitting phrase “thank you”

For not giving up on me

Because of you, I found the man of my dreams.


Regards,

Prince Charming






Thursday, January 4, 2024

The Ghost in the Mirror

 Each time I see the mirror,

A thick fog blankets it,

Nothing seems clearer.


I see everyone else,

I see them all,

Except for myself.


I see the scorching noon

And the raised brows

Of my uncles, aunts, cousins, and father

When they saw me combing a Barbie

And singing "pink is so my color."


My cheeks turn to tomatoes

When I recall

My mother beating me down

Because I stole her lipstick, her nail paint,

And dressed like a clown.


I nearly lose consciousness

Remembering the bullies

Pushing me to the corner,

Unable to race, wrestle, or kick,

Their favorite victim to pick.


I see eyes, countless eyes,

Eyes multiplying

On buses, planes, trains,

Mountains, beaches, and in rains,

Scanning and undressing

To my very veins.


I see hands, many hands,

Joining to form a band

To grope me, shame me down,

Every time they get a chance.


Now I hold a hammer and a wipe,

Capable of shattering it all,

Or wiping it clean,

But I do neither, and face it all.


Monday, January 1, 2024

To A Younger Me

 Hello                                               

Starting with a cliché, "How are you?"

But I know you're not fine, I see through

From a different time, yet the same

My letter aims to shatter myths and spark your flame.

 

I know maths has been traumatizing you,

dodging numbers that's all you do.

Fingers are pointed, questions are raised and

for every calculation wrong you’re to be blamed.

You pick up the compass and tattoo your vein.

 

Dyscalculia, a hidden burden to bear,

Struggle with numbers, it's only fair

To seek compassion, a kind embrace,

In a world where numbers hold their place.

 

Dyscalculia, a hidden burden to bear,

Struggle with numbers, it's only fair

To seek compassion, a kind embrace,

In a world where numbers hold their place.

 

That teacher, a cruel relentless voice,

Each lesson, cutting deep, no choice.

Counsellors blind to your inner fight,

Leaving scars that linger, day and night.

 

Supernatural's new season is in the air,

Sam and Dean, their trials to bear.

You hide behind covers, seeking rescue,

Yet in truth, no saviour will pursue.

 

You crave a guiding hand when esteem is low,

Becoming Sam, seeking a Dean to show

That life's not scripted, but reality's scene,

You're both Sam and Dean, strong and keen.

 

That new girl, causing endless strife,

Shaming you, wounding your life.

Naive to your pain, scars won't heal,

The bully's her, it's her lack of zeal.

 

Decency is absent, she lacks that grace,

You're not her punching bag, embrace

The truth, is she's the problem in every fact,

Her lack of kindness is a cruel act.

 

You go out of your way,

 

turn gloomy skies into sunny days,

 

your best friend forever squad

 

Hate to let you know it’s all a façade.

 

 

Leave the guilt behind, unlike them, you're unique,

The world's thirst to drain you, but don't be meek.

You're more than a prop, worth beyond a drop,

Don't let them use you, rise and stop.

 

Papa, the only man in your life who wishes nothing but the best for you

 

Rather than wrap up every ounce of happiness and gift it to you

 

Just glaring at him and it will widen your smile

 

He has set the bar skyrocketing high and no one dares to inch closer,

 

  Listen to your voice, never beat yourself down,

This letter ends, heed its profound.

 

From you future self