Saturday, April 29, 2017

Permanent One

so i had a conversation with him
presenting myself like some shameless being
as i keep on removing layers of secrets,
piece by piece
un-strangling myself, revealing it
how come he is so baring?
patient, so patient
where does the patience come from?
after all the things i did?
the situation i've been in
anyone could abandon
but he had the courage to stay
he doesn't want to leave
and i ask him?
i ask myself?
why? why in the name of God he doesn't want to leave?
he pays attention to my bullshit
doesn't listen, pays attention carefully
and trust me a million times i have tried to run away
tested myself, resisting him
i want to distract myself from him
but he doesn't want to, fucking becoming my habit
yet i asked him "will you ever leave me?"
"no way i don't see that happening ever, i won't ever leave"
" you really thing you can bare with my tantrums, my roller coaster emotions, put up with me"

"no, i believe i would love to be part of this crazy ride, i won't ever leave"
 my permanent one in this temporary world
guess you are my forever, guess your struck with me



Tuesday, April 18, 2017

Pagli si Ladki

उसकी हाय में मेरी हाय निकलती है
आह में जब वो आहें भरती है
खुद तो पागल है
मुझे भी पागल करती है

कभी यूँही हस्ती है
बिन बात के रूठा करती है
पर मान जाती है तभी बात बनती है
पगली सी वो है और मुझको भी पागल करती है

बिखरती है कलियाँ
खुश होते हैं दोनों जहाँ
मुड़ती है हर नज़र
उसके दीदार को
जब भी वो गली से निकलती है
क्या समझाओ उसे की उसकी एक झलक को तरसते मेरे नैन
पता नहीं उसके ख्यालों में कहाँ जाते मेरे दिन-रेन
बेखबर सी वो नहीं समझती है
पगली सी वो मुझको भी पागल करती है

परेशानी में जब यूँही हस्ती है
उसी दुःखी देखकर मेरी जान भी पिघलती है
बहकता हूँ मैं
महकती है वह राह
जिस राह से वह गुज़रती है
पगली सी वो है मुझको भी पागल करती है

एक मुस्कान पर नूर की बारिश बरसती है
उसके बिना ज़िन्दगी वक़्त की तरह कटा करती है
पर जब हो पास मेरे तभी ज़िन्दगी, ज़िन्दगी लगती है
वो चाहे मुझे दुत्कार भी दे
यह मेरी पहचान कुछ नालायक सी लगती है
पगली सी वो मुझे भी पागल करती है

रोता हूँ मैं भी जब वो चुपके से सिसकती है
कुछ कहने की हिम्मत करूँ कैसे ]
बात जब हलक में अटकती है
ढ़कने ऐसी रफ़्तार पकड़ती हैं
मेरी जान जब मेरे गले लगती है
आती है जान में मेरी जान
पगली सी वो मुझे भी पागल करती है

Sunday, April 2, 2017

Sapno ke Sweater

सपनो की ऊन से आशाओं के स्वेटर बुनते -बुनते
कुछ करने की माला में चाहतों के मोती पिरोते -पिरोते
पुराने जंग लगे शीशे से बदलाव की बातें करते -करते
आसमान से ऊँची अभिलाषा को धुआं देखते-देखते
सोच की उधेड़भुन करते -करते
ये जान लिया की जवानी की किस्मत बूढ़ी उँगलियों सी कमज़ोर हो चुकी है
झुर्रियां पर चुकी है उस जोश में
जो रगों में बहता था कभी
वो बसंत राग नहीं रहा अभी

हज़ार बार टूट- टूट कर बिखरते- बिखरते
खुद को संभालते हुए समझते -समझते
ये जान लिया
पहचान लिया
की खेल -खेल में की गयी गलतियां जीवन का सबक बन जाती
पुष्प का क़त्ल क्यों जब पतछड़ में डालियाँ बिखर जाती
और अश्रु तो बहोत बहाये पर आंख से निकले आंसू वापिस नहीं आते
सप्तश हो गया की
वक़्त हे जीवन का अध्यापक है
उस माथे का
इन हथेलियों का
भाग्य विधाता है !




Nashe Mein Hoon

आज नशे में हूँ
आज सच में नशे में हूँ
बहका हुआ सा , महका हुआ सा
कितने नशे में हूँ
अब तुम पूछोगे कौन- से नशे में
जाओ ना, तुम कितने कमज़ोर हो
तुम्हारा नशा तो उन रंगीन बोतलों में भर कर आता है
और बुलबुलों में काफिर हो जाता है
और यहाँ मेरा नशा तुमसे आता है
ज़िक्र होता है जब तुम्हारा
यह नशा बढ़ता हे जाता है
हाय ये मेरा नशा
नहीं! नहीं! नहीं!
ये नशा नहीं प्यार का
प्यार का नहीं है ये नशा
मैं तो यूँही बिखर गया हूँ
टूटने में कितना नशा
और तुझ में बरबाद होने में कितना मज़ा
एक तेरी ही वजह से बेमतलब सी ये दुनिया हो गया है
बेमतलब सा है ये जीना हो गया है
इतने वाकिफ है हम तेरी बेवफाई की आदतों  से
की अब तो सच और झूठ में भी फर्क करना कम हो  दिया है
यह जो मुझे तेरा बेइंतेहा नशा हो गया है